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संदीप कंबोज
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खुदाई में खुला राज : अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े हैं लोहारी राघो के तार


  •   3 हजार साल पूर्व पत्थर का काम  भी करते थे लोहारी राघो के बाशिंदे        
  •    अरावली से पत्थर लाकर बनाते थे खिलौने, बर्तन, मालाएं, मूर्तियां व अन्य उत्पाद 
  •    साथ सटे हड़प्पाकालीन महानगर राखी गढ़ी में बेचते थे उत्पाद
तोशाम स्थित अरावली पर्वत श्रृंखला का नजारा 
लोहारी राघो। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई के दौरान निकला प त्थर का  टुकड़ा।    तस्वीर : प्रवीन खटक

                                                                 संदीप कम्बोज। लोहारी राघो.कॉम
लोहारी राघो। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई से यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि गाँव लोहारी राघो का इतिहास 3 हजार वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। ( Lohari-Ragho-residents-used-to-do-stone-work-3-thousand-years-ago)  3 हजार साल पूर्व इस इलाके के बाशिंदे खेती के साथ-साथ पत्थर का भी काम करते थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय(बीएचयू) द्वारा इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सहयोग से गाँव लोहारी राघो में अब तक दो बार की गई खुदाई में मिले ढ़ेर सारे छोटे-बड़े पत्थरों के टूकड़े व अवशेष इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इस गाँव में कभी पत्थर नक्काशी का कार्य किया जाता था। वर्ष 2015-16 व वर्ष 2017-18  में दो बार गाँव के अलग-अलग इलाकों में की गई खुदाई में पत्थर के भारी तादाद में खंडित खिलौने, बर्तन, मालाएं, मनके, मूर्तियां व अन्य उत्पाद मिले हैं जिनकी कार्बन डेंटिंग की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये किस काल के हैं, इन अवशेषों की उम्र कितनी है? गाँव लोहारी राघो में खुदाई कार्य का निर्देशन करने वाले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रविंद्रनाथ ने लाहारी राघो.कॉम टीम को फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि लोहारी राघो में अब तक की खुदाई में मिले अवशेष 3 हजार से भी ज्यादा वर्ष पुराने हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि लोहारी राघो के कोसों दूर-दूर तक भी कोई पथरीला इलाका या पहाड़ नहीं मिला है। खुदाई में मिले पत्थरों के छोटे व बड़े टुकड़े अरावली पर्वत श्रृंखला के प्रतीत हो रहे हैं। उस समय यहाँ रहने वाल पत्थर कारोबारी इन पत्थरों को संभवत: अरावली पर्वत श्रृंखला से लेकर आते थे जिससे यह पता चलता है कि यहाँ के लोग कितने ज्यादा मेहनती थे। इतनी दूर से पत्थर लेकर आना और फिर उसे तराशकर उनके खिलौने, बर्तन, मालाएं, मूर्तियां व अन्य उत्पाद बनाकर बेचने में कितनी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती होगी। अरावली पर्वत श्रृंखला की अगर बात करें तो वर्तमान में लोहारी राघो के सबसे नजदीक भिवानी के तोशाम में स्थित है। संभवत: लोहारी राघो के पत्थर कारोबारी भी उस समय तोशाम व उसके आस-पास के इलाके से पत्थर लाते होंगे। 

लोहारी राघो। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई  में मिले पत्थर के टुकड़े ।    तस्वीर : प्रवीन खटक
   
लोहारी राघो। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई  में मिले  मिट्टी के बर्तन ।    तस्वीर : प्रवीन खटक
  खुदाई में मिले बर्तन बताएंगे 3 हजार साल पूर्व क्या खाते-पीते थे लोहारी के लोग 
 बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रविंद्रनाथ ने बताया कि खुदाई में मिले मिट्टी व पत्थर के बर्तनों के भीतरी सतह की भी बारिकी से जाँच की जा रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि 3 हजार साल पूर्व यहाँ के लोगों का खान-पान क्या था ? इस पर शोध  अभी जारी है। 


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Sandeep Kamboj

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"मैं संदीप कंबोज, लोहारी राघो की मिट्टी का एक छोटा सा अंश हूँ। मेरा उद्देश्य पत्रकारिता और ब्लॉगिंग के माध्यम से हरियाणा की समृद्ध विरासत, विशेषकर हड़प्पा कालीन इतिहास को जीवंत रखना है। मेरा मानना है कि हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, भविष्य का वृक्ष उतना ही विशाल होगा। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं आपको अपने गाँव के इतिहास, संस्कृति और आधुनिक बदलावों की यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ।"

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