- वर्ष 1807 में बाबा बख्शू शाह के चोला छोड़ने (देह त्यागने) के उपरांत आज तक भी परिजनों ने सहेजकर रखी है यह कैप
- बाबा बख्शू शाह की टोपी की अब हो चुकी है जर्जर हालत
संदीप कम्बोज। प्रवीन खटक
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| सूफी फकीर बाबा बख्शू शाह की 17वीं शताब्दी की टोपी |
यहाँ पढ़ें बाबा बख्शू शाह की इस टोपी का दिलचस्प किस्सा
बाबा बख्शू शाह की पांचवीं पीढ़ी से ताल्लुक रखने वाले असगर अली बताते हैं कि उनके पिता इमाम अली व उनके भाई इस्लामद्दीन,निहाद मोहम्मद उर्फ निहातु (बाबा बख्शू शाह की चौथी पीढ़ी) वर्ष 1947 में गाँव लोहारी राघो से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जिला मुल्तान स्थित गाँव टिब्बा रावगढ़ आकर बस गए। वे अपने साथ बाबा बख्शू शाह की सबसे खूबसूरत यादगार के तौर पर उनके सिर की यही टोपी भी लाए थे। अब सवाल यह था कि यह टोपी रखेगा कौन। इस टोपी को सहेजकर रखने को लेकर इमाम अली व उनके भाईयों के बीच अक्सर विवाद हो जाता। इस टोपी को इमाम अली के परिवार के पास रखा गया था लेकिन बाबा बख्शू शाह की पीढ़ी के अन्य परिवार भी इस टोपी को रखना चाहते थे। एक दिन इस्लाद्दीन के परिवार के सदस्य इस टोपी को चुपके से चुरा ले गए। उन्होंने इस टोपी को अपने कच्चे मकान के अंदर ले जाकर रख दिया। बताते हैं कि एक दिन रात में इतनी भयानक बरसात आई कि वो कच्चा मकान ढ़ह गया और नाले के साथ में सटा होने के कारण सभी कच्ची र्इंटें व कमरे में रखा सारा सामान भी बरसात के पानी में बह गया। इस्लामद्दीन अपने परिजनों समेत बाहर सो रहे थे। बरसात थमने के बाद जब मकान को संभाला गया तो सिर्फ बाबा बख्शू शाह की इस टोपी को छोड़कर बाकि सारा सामान नाले में बह गया। यहाँ तक कि मकान की कच्ची र्इंटे भी पानी के तेज बहाव में कुछ तो बह गई और शेष बची र्इंटें पिघल गई । तबसे लेकर यह टोपी अब इमाम अली के परिवार में उनके बेटे असगर अली के पास ही सुरक्षित है।
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