- 7.50 रुपए सालाना डाकघर में जमा करवाना होता था मनोरंजन टैक्स
- कुछ चुनिंदा घरों में ही होता था रेडियो, सुनने के लिए रोजाना सजती थी महफिल
- आकाशवाणी के ‘सांझा चुल्हा’ व ‘तप्सरा’ कार्यक्रम थे पहली पसंद
संदीप कम्बोज। लोहारी राघो.ईन हिसार। वर्तमान में भले ही मनोरंजन के हजारों साधन उपलब्ध हों लेकिन आज से 60-70 साल पहले सिर्फ रेडियो ही मनोरजंन का एकमात्र साधन था। 70 के दशक में रेडियो केवल गिने-चुने लोगों के पास ही हुआ करते थे और रेडियो का इतना रुझान था कि हर युवा साइकिल चलाते हुए गले में ट्रांजिस्टर टांगकर गाना बजाते हुए निकलना अपनी शान समझता था। इस दौर में रेडियो रखना हर किसी के लिए संभव भी नहीं था, क्योंकि गरीबी अधिक थी। रेडियो न रखने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि रेडियो सुनने वालों को सालाना मनोरंजन टैक्स भी अदा करना पड़ता था। 70 के दशक में रेडियो सुनने के लिए लाईसेंस लेना पड़ता था और सालाना 7.5 रुपये मनोरंजन कर पोस्ट आफिस में जमा करवाना पड़ता था। बात अगर जिला हिसार के गाँव लोहारी राघो की करें तो शुरुआत में यहां कुछ चुनिंदा 2-4 घरों में ही रेडियो हुआ करता था। इस दौर में गाँव लोहारी राघो में सबसे पहले रेडियो लेकर आने वाले ग्रामीण गुगन राम भट्टी थे। रेडियो के शौकीन रहे गुगन राम भट्टी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन रेडियो का लाईसेंस आज भी उनके बेटे राजकुमार भट्टी ने संभाल कर रखा है। लोहारी राघो रामलीला में रावण का किरदार अदा कर पहचान बना चुके राजकुमार भट्टी बताते हैं कि उनके पिताजी को रेडियो सुनने का बहुत शौंक था तो सबसे पहले वे ही हांसी से रेडियो लेकर आए थे। उस समय गाँव में रेडियो मरम्मत के लिए कोई मैकेनिक भी नहीं था तो रिपेयरिंग के लिए भी हांसी ही जाना पड़ता था। काफी साल बाद गाँव लोहारी में बस स्टैंड पर एक अनेजा रेडियो रिपंयरिंग की दुकान खुली थी। उन्होंने बताया कि 70 के दशक में हरियाणवी-पंजाबी गीतमाला का ‘सांझा चुल्हा’ व आज के हालात का ‘तप्सरा’ सबसे लोकप्रिय प्रसारण थे। उस कार्यक्रम के समय सड़कों पर सन्नााटा छा जाता था। रोजाना रात साढ़े आठ बजे से सवा नौ बजे तक हिंदी व अंग्रेजी समाचारों का प्रसारण होता था जिसे सुनने के लिए लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। रोजाना प्रसारित होने वाला एक ही फिल्म के गानों की गीतमाला वाला कार्यक्रम भी लोगों की पहली पसंद था।
आज क दौर में भले ही हमें देश-दुनिया की पल-पल की जानकारी हमें इंटरनेट, सोशल मीडिया प्लेकटफार्म, मोबाईल व न्यूज चैनलों पर मिल जाती हो लेकिन आज से 50 साल पहले तक हर तरह की जानकारी उपलब्ध करवाने का एकमात्र साधन रेडियो ही था। रेडियो की इन मधुर स्मृतियों को आज भी अपने दिल में संजोकर रखने वाले रेडियो प्रेमी बताते हैं कि उस समय 1962 व 1971 के युद्ध के दौरान रेडियो पर समाचार सुनकर कस्बे-कस्बे में गम या खुशी का माहौल बन जाता था। जितने समय प्रसारण चलता था, उतने समय तक सभी उससे चिपके रहते थे। क्रिकेट व सभी खेलों के बारे में रेडियो कॉमेंट्री सुनकर ही जानकारी मिल पाती थी। हर वर्ग के लिए अलग-अलग चलने वाले प्रसारण आकर्षण के केंद्र हुआ करते थे। टेलीविजन के आने के बाद रेडियो की संख्या घटने लगी।
मनोरंजन टैक्स माफ किए जाने पर मनाया था जश्न
बतातें हैं कि रेडियो सुनने के लिए सालाना 7.5 रूपए मनोरंजन टैक्स के तौर पर डाकघर में जमा करवाने पड़ते थे। रेडियो मालिक यह कर जमा नहीं करते थे तो ऐसे में हिसार से आबकारी इंस्पेक्टर आता और रेडियो रखने वालों की सूची बनाता था। फिर उनके पास जाकर रेडियो जब्त करने व अन्य न्यायालयीन कार्रवाई करने की धमकी देता था। 80 के दशक में जब केंद्र सरकार ने इस रेडियो पर लगे इस कर को माफ किया तो आमजनों ने काफी खुशियां मनाई थी। और उसके बाद रेडियो की बिक्री में उछाल आ गया था। अब हर घर में रेडियो ने अपनी पहुंच बना ली थी। बाद में पूछ-परख घट गई। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात का प्रसारण होने के बाद रेडियो की वापस गांव-गांव में पूछ-परख बढ़ी है।
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