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संदीप कंबोज
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Welcome to Harappa Village लोहारी राघो इतिहास की मिट्टी से लेकर विकास, संस्कृति और एकता का संगम खबरें, विकास और हमारी पहचान अब एक ही मंच पर जो छुपाया जा रहा है वही हम दिखाएंगे हम किसी पार्टी या नेता के गुलाम नहीं हम सिर्फ सत्य और संविधान के साथ

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Welcome to Harappa Village Lohari Ragho : इतिहास की मिट्टी से लेकर विकास, संस्कृति और एकता का संगम। देखें गाँव लोहरी राघो की आधिकारिक वेबसाइट — खबरें, विकास और हमारी पहचान अब एक ही मंच पर

लोहारी राघो के विकास पुरुष नंद किशोर चावला की 35 साल की संघर्ष गाथा, जिन्होंने राजनीति और सिस्टम से लड़कर गाँव का विकास कराया,पढ़ें एक आम नागरिक बनाम पूरे सिस्टम की कहानी

  •  ये हैं लोहारी राघो के असली विकास पुरुष जिसने सत्ता, सिस्टम और साजिशों को दी खुली चुनौती
  •  जब नेता और उनके दलाल विकास रोकते रहे और एक आम नागरिक लिखता रहा विकास की इबारत
  •  बिना पद और सत्ता के नंद किशोर चावला कैसे लोहारी राघो को विकास की राह पर लाया 
  • “एक आदमी, पूरा विकास तंत्र – लोहारी राघो का असली हीरो”


Lohari Ragho Development Man: How Nand Kishore Chawla Challenged Politics and System


संदीप कम्बोज

भारत के गाँवों में विकास आमतौर पर सत्ता के गलियारों से आता है। मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, सरपंच और अफसरों की फाइलों से। लेकिन हरियाणा के हांसी जिले के गाँव लोहारी राघो में यह नियम उल्टा है। यह गाँव इस सामान्य नियम का अपवाद बन चुका है। ( Nand Kishore Chawla vs Politics & Corrupt System) यहाँ विकास की कहानी सत्ता से नहीं, यहाँ विकास की कहानी एक जिद्दी, मेहनती और सिस्टम से टकराने वाले समाजसेवी द्वारा लिखी गई है। लोहारी राघो आज जिस विकास की तस्वीर पेश करता है, वह किसी मुख्यमंत्री, विधायक या सरपंच की देन नहीं है। यह विकास उसी जिद्दी व्यक्ति की देन है, जिसने कभी सत्ता की कुर्सी नहीं देखी, कभी पंच या सरपंच नहीं बना, फिर भी 35 वर्षों तक अपने गाँव के लिए लड़ता रहा। इस जिद्दी व्यक्ति का नाम है नंद किशोर चावला। यह कोई साधारण नाम नहीं है। यह नाम 35 वर्षों की लड़ाई, विकास के लिए सैकड़ों धरने प्रदर्शन, हजारों पत्र, सैकड़ों सरकारी फाइलें और करोड़ों की विकास योजनाओं का पर्याय बन चुका है। यह कहानी केवल एक समाजसेवी की नहीं है, यह कहानी एक अकेले आदमी और पूरे राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र के संघर्ष की है। (Lohari Ragho development) यह कहानी केवल लोहारी राघो की नहीं, यह पूरे भारतीय लोकतंत्र की असली तस्वीर है। यह कहानी है उस आदमी की, जिसने साबित किया कि सिस्टम से बाहर रहकर भी सिस्टम को झुकाया जा सकता है।


जब पूरा सिस्टम सो रहा था, एक आदमी जाग रहा था
 (One Man vs System – The Real Development Hero of Lohari Ragho) भारत के ग्रामीण लोकतंत्र में सरपंच, पंच, विधायक और सांसद सत्ता के प्रतीक होते हैं। लेकिन लोहारी राघो में सत्ता नहीं, संकल्प सत्ता बन गया। जब नेता वोटों के गणित में उलझे थे,जब अधिकारी फाइलों को धूल चटा रहे थे, जब दलाल पंचायती फंड पर नजर गड़ाए बैठे थे, तब नंद किशोर चावला सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। वे अकेले थे, न उनके पास कोई पद था,न कोई सरकारी अधिकार,न कोई राजनीतिक संरक्षण। फिर भी उन्होंने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े नेता नहीं कर पाए।

अलमारियों में कैद विकास का इतिहास

नंद किशोर चावला के घर की अलमारियाँ केवल कागजों से भरी नहीं हैं। ( Nand Kishore Chawla lohari ragho) वे अलमारियाँ लोहारी राघो के विकास का दस्तावेजी इतिहास हैं।  प्रधानमंत्री, राष्टÑपति, मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद, विभिन्न विभागों के सचिव, डायरेक्टर, जिला अधिकारी शायद ही कोई ऐसा अधिकारी होगा जिसके पास उन्होंने गाँव लोहारी राघो के विकास के लिए पत्र न लिखे हों। उनके द्वारा लिखे गए ये पत्र साधारण शिकायत नहीं थे। ये पत्र लोहारी राघो के विकास का पूरा रोडमैप थे। गाँव में आज जितना विकास कार्य दिखई दे रहा है, उनमें से 95 फीसद से अधिक नंद किशोर चावला की ही देन है। सड़कें,  बाईपास, स्कूल अपग्रेड, अनाज मंडी, बैंक, पशु अस्पताल, रजवाहा, सिंचाई, बिजली, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण सब कुछ जो भी आज यहां दिखाई पड़ रहा है, यह सब नंद किशोर की ही मेहनत का परिणाम है। 

 

35 साल की जंग : बिना सत्ता, बिना पद, केवल जुनून
पिछले 35 वर्षों से नंद किशोर चावला रोज हिसार से लगभग 50 किलोमीटर का सफर तय कर लोहारी राघो आते हैं। यह सफर केवल दूरी का नहीं, संघर्ष का है। ( 35 Years Struggle of Nand Kishore Chawla for Lohari Ragho Development) उन्होंने अपने जीवन के हजारों दिन सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियों पर बिताए। कभी गाँव की सड़कों व दूसरे गाँवों से जोड़ने वाले लिंक रोड़ के लिए, कभी स्कूल के लिए, कभी अनाज मंडी के लिए, कभी पानी के लिए, कभी सिंचाई के लिए, कभी बिजली के लिए तो कभी अस्पताल, पुस्तकालय, महिला कॉलेज, पुलिस चौकी, आईटीआई, गाँव को हिसार-जींद रेलवे लाईन तथा हाईवे से जोड़ने के लिए। अभी हाल ही में नंद किशोर चावला की मांग पर प्रदेश सरकार ने लोहारी राघो में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए हरी झंडी दे दी है। इसके लिए ग्राम पंचायत से भूमि मांगी गई है ताकि पीएचसी का निर्माण किया जा सके। उन्होंने राजनीति व समाजसेवा को पैसा कमाने का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने प्रशासन को विकास का हथियार बनाया।

राजनीति की जलन : जब विकास सबसे बड़ा दुश्मन बन गया
लोहारी राघो की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि विकास करने वाला व्यक्ति सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन बन गया। जब भी नंद किशोर कोई परियोजना लेकर आते, स्थानीय नेता और उनके दलाल उस काम को रोकने में लग जाते। क्यों? क्योंकि उन्हें डर था कि, अगर असली विकास हो गया, तो पंचायती फंड की लूट बंद हो जाएगी। अगर पारदर्शिता आ गई, तो कमीशनखोरी खत्म हो जाएगी। अगर ईमानदार सरपंच आ गया, तो दलालों का धंधा चौपट हो जाएगा। इसलिए नंद किशोर चावला को सत्ता से दूर रखने की साजिÞशें रची गईं।

अगर साजिशें न होतीं, तो लोहारी राघो क्या होता?
कल्पना कीजिए, अगर नंद किशोर चावला को पूरी तरह काम करने दिया जाता, तो आज लोहारी राघो शिक्षा का केंद्र बन चुका होता, महिला शिक्षा में अग्रणी होता, तकनीकी शिक्षा का हब होता, स्वास्थ्य सुविधाओं में मॉडल गाँव होता, पर्यटन का केंद्र बन सकता था (राखीगढ़ी कनेक्शन के कारण) लेकिन राजनीति और उसमें पनपे चंद नीच दलालों ने विकास को रोक दिया।

 
एक आदमी, पूरा योजना आयोग
नंद किशोर चावला गाँव के लिए योजना आयोग की तरह थे। वे समस्या देखते थे, समाधान लिखते थे, बजट मांगते थे और मंजूरी करवाते थे।

विकास की ऐतिहासिक टाइमलाइन : चावला के दस्तावेजों से निकली क्रांति

  • 1989: 9 लाख रुपये सड़क निर्माण के लिए और 45 हजार रुपये स्कूल कमरे के लिए ग्रांट
  • 1990: टेलीफोन एक्सचेंज
  • 1990: अनाज मंडी सब-यार्ड
  • 1994: डांटा-लोहारी सड़क मार्ग निर्माण
  • 1995: हैबतपुर-लोहारी सड़क
  • 1995: नेत्र चिकित्सा शिविर
  • 1996: पशु मेला
  • 1997: अनाज मंडी निर्माण
  • 1997: मार्केटिंग व प्रोसेसिंग सोसायटी
  • 1997: वाटर सप्लाई टैंक
  • 1997: मंडी प्लेटफॉर्म
  • 1997: लोहारी बाईपास
  • 1997: स्कूल 10वीं से 10+2
  • 1998: गेहूं और धान खरीद
  • 1999: केंद्रीय सहकारी बैंक
  • 2000: पैक्स
  • 2000: मसूदपुर-लोहारी-सिसाय सड़क
  • 2003: मंडी प्लेटफॉर्म भूमि दान
  • 2004: पशु अस्पताल
  • 2005: बीएसएनएल टावर
  • 56 लाख ग्रांट: हांसी-लोहारी-खेड़ी चौपटा सड़क
  • 2011: पंजाब नेशनल बैंक
  • 2016: मंडी शेड
  • 2017: सरसों खरीद
  • 2020: कपास खरीद
  • 2022: दुर्गा मंदिर व धर्मशाला के लिए भूमि दान
  • 2022: सुभाष चंद्रा स्पोर्ट्स अकेडमी
  • 2022: मसूदपुर माइनर विस्तार
  • 2022 : 33 केवी बिजली घर 

रेलवे और हाईवे: विकास की दो बड़ी हत्याएँ

हिसार-जींद रेलवे लाइन : राजनीति द्वारा मारा गया सपना
वर्ष 1994 में नंद किशोर चावला की मांग पर भारतीय रेलवे ने हिसार-जींद रेल लाइन का सर्वे कराया।
यह परियोजना पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बदल सकती थी। लेकिन नेताओं ने जानबूझकर इसे रोक दिया।
कारण? कहीं विकास का श्रेय नंद किशोर चावला को न मिल जाए। यह केवल परियोजना की हत्या नहीं थी, यह पूरे क्षेत्र के विकास की हत्या थी।

हिसार-जींद-राखीगढ़ी हाईवे : 11 साल का संघर्ष और फाईल रद्द
2015 में नंद किशोर चावला ने हिसार-जींद-राखीगढ़ी लिंक हाईवे की मांग उठाई। उद्देश्य था हड़प्पाकालीन राखीगढ़ी और लोहारी राघो को सीधे हिसार-जींद से जोड़ना। लेकिन फाइलें रोकी गईं, नेताओं और गाँव में मौजूद उनके दलालों ने विरोध किया। दलाल सक्रिय हुए। 11 साल से नंद किशोर चावला सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। अभी हाल ही में 14 जनवरी 2026 को प्रदेश सरकार ने इलाके के नेताओं व उनके चंद नीच दलालों की मांग पर इस महत्वपूर्ण परियोजना को रद्द कर दिया है। इस खुशी में नेताओं के दलाल लड्डू बांटकर जश्न मना रहे हैं कि वे अपने आका नेताओं और राजनीतिक पहुंच के चलते इस बड़े प्रोजेक्ट को रुकवाने में कामयाब रहे। इन नीच दलालों को तनिक भी मलाल नहीं है कि वे विकास कार्यों को रुकवाकर गाँव के लोगों के साथ धोखा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें तो बस नेताओं की चापलूसी से मतलब है। वह चापलूसी गाँव के भले के लिए या बुरे के लिए, उससे इन दल्लों को कोई सरोकार नहीं है।

नंद किशोर चावला : एक आदमी नहीं, एक आंदोलन
नंद किशोर चावला केवल समाजसेवी नहीं हैं। वे एक चलती-फिरती विकास संस्था हैं। उन्होंने साबित किया कि, सत्ता के बिना भी सत्ता बदली जा सकती है। पद के बिना भी विकास कराया जा सकता है।

लोहारी राघो के लिए आज भी संघर्ष जारी
इतनी उपेक्षा के बावजूद नंद किशोर चावला रुके नहीं। आज वे अनाज मंडी के पास दुर्गा मंदिर तथा धर्मशाला का निर्माण करवा रहे हैं। साथ ही गाँव को सब तहसील बनाए जाने, पुलिस चौकी, पुरातत्व संग्रहालय,  लाइब्रेरी, महिला कॉलेज, आईटीआई तथा पॉलिटेक्निक समेत अनेक मांगों के लिए लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं। हाल ही में सरकार ने पीएचसी के लिए पंचायत से जमीन मांगी है, यह भी उनकी ही कड़ी मेहनत का परिणाम है।

क्यों नहीं बनने दिया गया सरपंच ?
यह सवाल केवल लोहारी राघो का नहीं, पूरे ग्रामीण लोकतंत्र का सवाल है। जिस व्यक्ति ने गाँव के लिए करोड़ों की योजनाएँ पास करवाईं,जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा रहा, वह सरपंच क्यों नहीं बन पाया? उत्तर सीधा है, भ्रष्ट व्यवस्था को ईमानदार और मेहनती नेतृत्व से डर लगता है। अगर नंद किशोर चावला सरपंच बन जाते तो पंचायती फंड की लूट बंद हो जाती। कमीशनखोरी खत्म हो जाती। फर्जी बिलों का खेल बंद हो जाता। वास्तविक विकास शुरू हो जाता। और सबसे बड़ी बात नेताओं के दलालों का सूपड़ा साफ हो जाता। उन्हें हराम की झूठन चाटने को न मिलती जो उन्हें हर बार के सरपंच से  मिलती आ रही है। इसलिए उन्हें सत्ता से दूर रखा गया।

विकास पुरुष से डरती राजनीति
अगर नंद किशोर चावला सरपंच बन जाते,तो गाँव में विकास की बाढ़ आ जाती और भ्रष्टाचार की दुकान बंद हो जाती।

लोहारी राघो का असली नेता कौन?
नंद किशोर चावला ने दिखा दिया कि नेता वह नहीं जो कुर्सी पर बैठे। नेता वह है जो जनता के लिए खड़ा हो। लोहारी राघो का विकास पुरुष वही है, जिसने बिना कुर्सी के गाँव को कुर्सी पर बैठा दिया। भारत के गाँवों में लोकतंत्र तभी सफल होगा, जब नंद किशोर चावला जैसे लोग सत्ता में आएँगे और दलालों की सत्ता समाप्त होगी।

लोहारी राघो के लोगों के लिए खुला सवाल, जाग जाओ अब भी समय है
आज लोहारी राघो के लोगों को सोचना होगा, क्या वे विकास चाहेंगे या राजनीति? क्या वे ईमानदारी चाहेंगे या दलाली ? क्या वे भविष्य चाहेंगे या झूठे वादे? गाँव का भविष्य चुनावी पोस्टरों से नहीं, विकास के संकल्प से बनता है। इसलिए ग्रामीणों को चाहिए कि वे गाँव को पिछले 30-40 साल से खराब करते आ रहे नेताओं के दल्लों का खुलकर बायकोट करें और नंद किशोर जैसे व्यक्ति को ग्राम पंचायत की कमान सौंपकर देखें। फिर देखें लोहारी कैसे विकास की इबारत लिखता है। क्योंकि सत्ता व पद रहने पर वे और ज्यादा खुलकर गाँव का विकास करवा पाएंगे। क्योंकि उन्हें विकास कार्य करवाने का अनुभव है और किस काम को कहाँ से और कैसे करवाना है, वे बखूबी जानते हैं। बिना किसी पद पर रहते जब वे गाँव में इतना विकास करवा सकते हैं तो पद पर आने के बाद क्या-क्या करवा सकते हैं, ग्रामीण स्वंय अंदाजा लगा सकते हैं। ग्रामीणों को चाहिए कि अब समय है आ गया है गाँव में मौजूद नेताओं के दल्लों व अलग-अलग जातियों के स्वंयघोषित ठेकेदारों को पहचान लें जो नेताओं से नजदीकी का फायदा उठाकर सिर्फ और सिर्फ अपने घर भरते आ रहे हैं। नेताओं से नजदीकी की बदौलत अपने घर-परिवारों, रिश्तेदारों, चेले-चापलूसों को सरकारी,ठेके की नौकरियां व सरकारी ठेके दिलवा रहे हैं। और ये नेताओं के दल्ले पगलाए कुत्तों की तरह गाँव के सार्वजनिक विकास कार्यों की फाईलों में नेताओं को बोलकर अड़ंगा डलवाते हैं ताकि गाँव में कोई विकास कार्य सिरे न चढ़े कहीं नंद किशोर चावला के नंबर न बन जाएं। इसलिए ग्रामीणों को चाहिए कि वे गाँव के दुश्मन इन सफेदपोश दल्लों को पहचान कर इनका खुलेआम बायकोट करें और इनकी घटिया, नीच हरकतों के बारे में गाँव के बच्चे-बच्चे तथा इनके आका नेताओं को भी बताएं कि किस तरह से ये नीच हमारे गाँव के विकास में अड़चन डालते आ रहे हैं। 

संदीप कम्बोज
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

 

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"मैं संदीप कंबोज, लोहारी राघो की मिट्टी का एक छोटा सा अंश हूँ। मेरा उद्देश्य पत्रकारिता और ब्लॉगिंग के माध्यम से हरियाणा की समृद्ध विरासत, विशेषकर हड़प्पा कालीन इतिहास को जीवंत रखना है। मेरा मानना है कि हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, भविष्य का वृक्ष उतना ही विशाल होगा। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं आपको अपने गाँव के इतिहास, संस्कृति और आधुनिक बदलावों की यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ।"

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