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संदीप कंबोज
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जानें क्या है रोघी खाप का इतिहास : लोहारी राघो के इस ऐतिहासिक पीपल के नीचे होता था 24 गाँवों की महापंचायत का आयोजन, लिए जाते थे सांझे फैसले, यहीं था सैकड़ों साल पुराना ऐतिहासिक रोघी खाप चबुतरा

Roghi Khap Lohari Ragho History | ऐतिहासिक चबूतरा व खाप का इतिहास

                                             संदीप कम्बोज

लोहारी राघो । ऐतिहासिक गाँव लोहारी राघो में एक ऐसा ऐतिहासिक पीपल का पेड़ विद्यमान है जिसकी गौरव गाथा अद्भुत व बेहद ही निराली है। (complete-history-of-roghi-khaap-lohari-ragho-historical-chabutra-roghi-khap) सैकड़ों साल पुराना यह ऐतिहासिक पीपल का पेड़ आज भी गाँव में हांसी वाले जोहड़ के उत्तर में स्थित है जिसकी खासियत सुन आप भी हैरान रह जाएंगे। Roghi khap chabutra यह वही ऐतिहासिक पेड़ है जिसके नीचे कभी 24 गाँवों की रोघी खाप महापंचायत का आयोजन किया जाता था। 80 के दशक तक गाँव लोहारी राघो ऐतिहासिक रोघी खाप का मुख्यालय रहा है जिसके चलते 24 गाँवों के सांझे मसलों को यहीं सुलझाया जाता था, ठीक इसी पीपल की छांव में। Haryana khap history रोघी खाप के प्रधान सुमेर सिंह जागलान के मुताबिक इसी जगह रोघी खाप का ऐतिहासिक चबूतरा मौजूद था। वे बताते हैं कि सैकड़ों साल पहले गाँव लोहारी राघो में काफी जाट परिवार भी आबाद थे जिनमें कुछ हिंदु जाट तो कुछ मुस्लिम जाट थे। उस समय गाँव लोहारी राघो के बाशिंदें खापों के साथ पूरी सक्रियता से जुड़े थे। वर्ष 1987 तक भी गाँव लोहारी राघो में रोघी खाप का ऐतिहासिक चबुतरा मौजूद था। यह ऐतिहासिक चबुतरा हांसी वाले जोहड़ में पूर्व की तरफ एक महलनुमा भवन में बनाया गया था जिसे उस समय बंगला कहा जाता था। उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है कि आज से करीब 70-80 साल पूर्व भी यहां इस बंगले के अवशेष मौजूद थे लेकिन अब वक्त के थपेड़ों के साथ-साथ इनका नामो-निशान खत्म हो चुका है। गाँव मसूदपुर निवासी रोघी खाप के महासचिव लेखक ज्ञान सिंह आर्य के मुताबिक आजादी से पहले जब यहाँ रोघी खाप की पंचायत का आयोजन होता था तो मुसलमानों के लिए हुक्का-पानी व भोजन का प्रबंध अलग होता था और हिंदुओं के लिए अलग। आजादी के बाद भी कई सालों तक इसी विशाल पीपल के पेड़ के नीचे रोघी खाप की पंचायत का आयोजन होता रहा है। वे बताते हैं कि आजादी से पहले गाँव लोहारी राघो में जाट परिवारों की संख्या काफी थी लेकिन ज्यादातर हिंदू जाट, मुसलमानों के प्रकोप के कारण या तो मुसलमान बन गए थे या फिर गाँव छोड़कर अन्य गाँवों को चले गए। जाट मुसलमान विभाजन के उपरांत पाकिस्तान चले गए थे। 

                 Roghi Khap Lohari Ragho History | ऐतिहासिक चबूतरा व खाप

 

सदियों पुराना है खापों का इतिहास
Roghi Khap historyLohari Ragho khap, यहां बता दें कि सर्वखाप का इतिहास सदियों पुराना यानि आदिकाल से है। सर्वखाप संगठन का  पुनर्गठन महाराजा हर्षवर्धन ने सन् 642 ई० में कन्नौज में किया था और इस संगठन का नामकरण सर्वखाप पंचायत भी महाराज हर्षवर्धन ने ही किया।

1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने लगा दिया था खापों पर बैन
Lohari Ragho history वर्ष 2006 से रोघी खाप के महासचिव ज्ञान सिंह आर्य के मुताबिक भारत में खापों का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। वर्तमान में अकेले हिसार जिला में सात खापें सक्रिय हैं जिनमें से सतरोल खाप सबसे बड़ी है। वे बताते हैं कि 1857 की क्रांति के दौरान खापों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेज खापों से इस कदर भयभीत हो चुके थे कि उन्होंने खापों पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। अब खापों को किसी तरह की पंचायत करने या कोई भी सामाजिक फैसला लेने का अधिकार नहीं था। हालांकि अंग्रेज सरकार से नजरें चुराकर खापें अपना कार्य गुप-चुप तरीके से करती रही और भाईचारा कायम रखने व सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अपने फैसले लिए जाते रहे। इन खापों ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ न केवल डटकर आवाज उठाई बल्कि समाज का ताना-बाना खराब करने वालों को करारा सबक भी सिखाया।

1980 में सर्वखाप के नेता कर्मपाल की पहल से दोबारा सक्रिय हुई खापें
History of Lohari Ragho Ramlila Written by Sandeep Kamboj 1980 के दशक तक हरियाणा में खापें पूरी तरह से निष्क्रिय रही। खापों को फिर से अस्तित्व में लाने के लिए सर्वखाप के नेता स्वामी कर्मपाल गुलकनी जो कि दिल्ली के धीरज पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं, ने 1980 में अभियान की शुरूआत की। गाँव-गाँव, घर-घर जाकर उन्होंने खापों में भागीदारी की अलख जलाई। वर्ष 1981 में स्वामी कर्मपाल ने सोनीपत के गोहाना में एक महासम्मेलन भी आयोजित किया जिसमें हरियाणा, उत्तर प्रदेश व आस-पास के प्रदेशों के लोगों ने हिस्सा लिया था। इसी सम्मेलन के दौरान गाँव लोहारी राघो निवासी रोघी खाप के पूर्व प्रधान रणबीर सिंह सिहाग सिसाय की मुलाकात भी स्वामी कर्मपाल से हुई और रोघी खाप को फिर से अस्तित्व में लाने का खाका तैयार किया गया।

126 साल बाद 1983 में पुन: अस्तित्व में आई रोघी खाप, रामकशिन दलाल मसूदपुर बने पहले प्रधान
ancient khap system, Roghi Khap मूल रूप से सिसाय निवासी चौ. रणबीर सिंह सिहाग अब गाँव लोहारी राघो में रहने लगे थे। यह रणबीर सिंह के प्रयास ही थे कि 126 साल बाद ऐतिहासिक रोघी खाप पुन: अस्तित्व में आई थी। रणबीर सिंह ने इसके लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। वर्ष 1981 व 1982 में लगातार दो साल तक उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को रोघी खाप के पुनगर्ठन के लिए जागरुक किया। उनकी मेहनत रंग लाई और वर्ष 1983 में रोघी खाप दोबारा से अस्तित्व में आ गई। रोघी खाप की सबसे पहली महापंचायत गाँव भाटला में आयोजित की गई थी जहाँ सर्वसम्मति से मसूदपुर निवासी रामकशिन दलाल को प्रधान व चौ. रणबीर सिहाग को सचिव चुने जाने के साथ पूरी कार्यकारिणी बना दी गई। वर्ष 1987 में रोघी खाप का चबूतरा गाँव लोहारी राघो से बदलकर गाँव डाटा में स्थापित कर दिया गया।

लोहारी राघो। गाँव डाटा में स्थित रोघी खाप का चबूतरा। Roghi khap chabutra  

चौ. रणबीर सिहाग ने 1983 में संभाली रोघी खाप की कमान

History of Lohari Ragho Ramlila Written by Sandeep Kamboj वर्ष 1983 में ही 6 माह बाद रोघी खाप की महापंचायत का आयोजन गाँव डाटा में किया गया। इस दौरान खाप के प्रधान रामकिशन दलाल ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए प्रधान पद से त्यागपत्र दे दिया। अब लोहारी राघो निवासी चौ. रणबीर सिहाग को सर्वसम्मति से खाप का प्रधान चुन लिया गया। वर्ष 1994-95 में चौ. रणबीर सिहाग के स्वास्थ्य कारणों के चलते सिसाय कालीरावण निवासी चौ. जयलाल को अस्थाई तौर पर खाप का कार्यकारी प्रधान नियुक्त कर दिया गया। चौ. रणबीर सिहाग वर्ष 2007 तक लगातार 24 साल तक रोघी खाप के प्रधान रहे। वर्ष 2007 में गाँव चैनत के पूर्व सरपंच मास्टर जगदीश चंद्र को खाप का प्रधान चुना गया लेकिन छह माह बाद उनका स्वास्थय अचानक खराब हो गया। इस पर उन्होंने प्रधान पद से त्यागपत्र दे दिया। एक साल बाद उनका देहांत हो गया।। वे करीब एक साल तक खाप के प्रधान रहे। वर्ष 2008 में सुमेर सिंह जागलान खाप के प्रधान बन गए। वर्तमान में भी खाप की कमान सुमेर सिंह जागलान के ही हाथ है। 4 जून 2017 को रणबीर सिंह सिहाग का भी 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

Roghi Khap Lohari Ragho historical chabutra Hisar

35 साल से गाँव डाटा में है रोघी खाप का मुख्यालय, चबूतरे के लिए पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह ने दी थी ग्रांट
"Roghi Khap Lohari Ragho historical chabutra Hisar" रोघी खाप के महासचिव ज्ञान सिंह आर्य बताते हैं कि जिला हिसार में सात खापें हैं। सबसे बड़ी सतरोल खाप है जिसमें कुल 45 गाँव आते हैं। दूसरे नंबर पर रोघी खाप है जिसमें 24 गाँव हैं। इसके अलावा सात बास खाप, बारह खाप, पंचग्रामी खाप पूनियां, भ्याण खाप व कुंडु पंचग्रामी खापें मौजूद हैं। ज्ञान सिंह आर्य के मुताबिक  गााँव लोहारी राघो और डाटा गाँव एक ही दादी की संतान बताए जाते हैं। रोघी खाप का नाम पहले राघो खाप 24 ही था जिसका प्रमाण यह है कि हमारी खाप में दो गाँव लोहारी राघो व सिंघवा राघो रिकॉर्ड में दर्ज हैं। मुख्य नाम राघो ही था जो कि हमारे वृद्धों के अनपढ़ होने की वजह से बोलचाल में रोघी के नाम से प्रचलित हो गया। ज्ञान सिंह आर्य का दावा है कि रोघी शब्द भाषा भेद के कारण ही आया है जिसे कई बार लोग रोगी भी लिख देते। रोघी नाम रोगी यानि मरीज शब्द का बिगड़ा हुआ नाम है। उन्होंने प्रबुद्धजनों से अपील की है कि वे भविष्य में खाप को रोघी न बुलाकर राघो खाप के नाम से ही बुलाएं क्योंकि सही नाम यही है। उनके मुताबिक वर्ष 1987 तक तो गाँव लोहारी राघो में खाप का चबूतरा था लेकिन पिछले 35 साल से खाप का मुख्यालय लोहारी राघो के साथ लगते गाँव डाटा में स्थित है। लोहारी राघो से चबूतरा स्थानांतरित करने की मुख्य वजह यह रही कि वर्तमान में यहाँ रहने वाले बाशिंदें खापों की परंपरा को नहीं जानते। उन्होंने बताया कि 1987 में पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह से डाटा गाँव में खाप के चबूतरे के लिए 24 हजार रुपए ग्रांट की डिमांड की गई थी जिस पर उन्होंने 20 हजार की ग्रांट मंजूर कर दी थी। ग्रांट मंजूर होने के उपरांत गाँव डाटा में चबूतरा बनाया गया।


रोघी खाप के अंतर्गत आने वाले गाँव व पंचायतें
लोहारी राघो, डाटा, मसूदपुर, सिसाय बोलान, सिसाय कालीरावण, महजत, सिंघवा राघो,सिंधड़, खानपुर, गुराना, राजली, सुलखनी, घिराय,खरकड़ी, चैनत, भाटला, खोखा, कुलाना, लालपुरा, कुतुबपुर,दयाल सिंह कालोनी,जग्गा बाडा, ढाणी बुखारी, भीमनगर, धर्मपुरा,बाडा सुलेमा, ढाड, बधावड़।

गाँव जो उजड़ चुके जो कभी रोघी खाप का हिस्सा थे
ठरवा, शाला डेरी, काजल खेड़ा, खेड़ी बरकेश

History of Lohari Ragho Ramlila Written by Sandeep Kamboj

नवनिर्वाचित सरपंच सोनू सरोहा।       फोटो : प्रवीन खटक

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"मैं संदीप कंबोज, लोहारी राघो की मिट्टी का एक छोटा सा अंश हूँ। मेरा उद्देश्य पत्रकारिता और ब्लॉगिंग के माध्यम से हरियाणा की समृद्ध विरासत, विशेषकर हड़प्पा कालीन इतिहास को जीवंत रखना है। मेरा मानना है कि हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, भविष्य का वृक्ष उतना ही विशाल होगा। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं आपको अपने गाँव के इतिहास, संस्कृति और आधुनिक बदलावों की यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ।"

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