- कान्हा-राधा से लेकर हर तरह के किरदार निभाती थी गांव की बेटियां
- प्रख्यात हास्य कलाकार व रामलीला के पूर्व डायरेक्टर लक्ष्मण दास जरगर ने वर्ष 1976 में की थी कृष्ण लीला मंचन की शुरूआत
- 2016 में लक्ष्मण दास जरगर के निधन के उपरांत कोई नहीं सहेज पाया यह अनमोल विरासत
Lohari Ragho Krishan Lila Janamashtami Story । Director Laxman Das Jargar
संदीप कम्बोज
लोहारी राघो। जिस प्रकार से लोहारी राघो की ऐतिहासिक रामलीला की देश-प्रदेश में विशेष पहचान रही है, ठीक उसी तरह से कृष्ण लीला का भव्य मंचन भी कभी लोहारी राघो की शान था जिसे देखने के लिए पूरा गाँव उमड़ पड़ता था। (Lohari Ragho Krishan Lila Janamashtami Story । Director Laxman Das Jargar ) जन्माष्टमी पर्व के अवसर पर गाँव लोहारी राघो में लगातार 40 साल तक कृष्ण लीला का मंचन जारी रहा लेकिन अफसोस इस अनमोल विरासत को हम सहेज नहीं पाए और अब हमारे पास सिवाए इसकी सुनहरी यादों के अलावा कुछ नहीं हैं। जनमाष्टमी पर्व पर लोहारी राघो में अब पहले जैसी रौनक दिखाई नहीं दे रही है जो 7 साल पूर्व तक थी। वजह है इस अनमोल विरासत को सहेजने वाले महान कलाकार लक्ष्मण दास जरगर का हमारे बीच से चला जाना। 1 फरवरी 2016 को लक्ष्मण दास जरगर के निधन के उपरांत इस कृष्ण लीला ड्रामा का भी चैप्टर बंद हो गया। जन्माष्टमी पर्व पर ग्रामीणों को अब रह-रहकर लक्ष्मण दास जरगर की याद आती है। आए भी क्यों ना, 40 साल का अरसा थोड़ा नहीं होता। इन 40 साल में न जाने कितनी ही स्कूली छात्राओं को उन्होंने प्रशिक्षण दिया और कितनी सुंदर-सुंदर झांकियों, गीतों व दृश्यों द्वारा कृष्ण लीला का ऐसा भव्य व अद्भुत मंचन किया कि देखने वाले दंग रह गए। लक्ष्मण दास जरगर की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने कृष्ण लीला से संंबंधित ड्रामा, डायलोग व गीतों को अपनी कलम से लिखा था। History of Lohari Ragho by Sandeep Kamboj Journalist आज जन्माष्टमी स्पेशल में विस्तार से पढ़ें आखिर कौन थे लक्ष्मण दास जरगर ओर उन्होंने कब व किस तरह से की कृष्ण लीला मंचन की शुरूआत। उनके रास्ते में क्या आई कठिनाईयां और उनकी प्रतिभा से जलने वाले विरोधियों ने उन्हें कैसे किया परेशान। विस्तार से बता रहे हैं विलेज ईरा के संपादक संदीप कम्बोज
जन्माष्टमी से दो माह पहले ही शुरू हो जाती थी रिहर्सल
Lohari Ragho History by Sandeep Kamboj Journalist रामा कल्ब रामलीला के पूर्व डायरेक्टर लक्ष्मण दास जरगर ने वर्ष 1976 में गाँव लोहारी राघो में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण लीला ड्रामा की शानदार शुरूआत की जो कि वर्ष 2016 तक लगातार 40 साल जारी रहा। कृष्ण लीला मंचन में सभी किरदार स्कूली छात्राओं द्वारा निभाए जाते थे। हर साल जन्माष्टमी से करीब 2 माह पहले से ही कृष्ण लीला के लिए रिहर्सल शुरू हो जाती थी। कृष्ण लीला ड्रामा की सबसे खास बात यह थी कि इसे स्वंय उन्होंने अपनी कलम से लिखा था। उनकी प्रतिभा से जलने वाले गाँव के ही कुछ लोगों द्वारा इस कृष्ण लीला ड्रामा को रूकवाने के लिए अनेक बार षडयंत्र भी रचे लेकिन लक्ष्मण दास जरगर अपने इरादे से टस से मस नहीं हुए और उन षडयंत्रकारियों को मुंह की खानी पड़ी।
कृष्ण लीला मंचन को बंद करवाने के लिए रचे गए थे कई षडयंत्र, हर बार नाकाम रहे षडयंत्रकारी
Lohari Ragho Krishan Lila History By Sandeep Kamboj Journalist लक्ष्मण दास जरगर को परेशान करने व उनके द्वारा शुरू किए कृष्ण लीला मंचन में अड़ंगा डालने वाले षडयंत्रकारी कोई ओर नहीं बल्कि उस समय की रामलीला के ही कुछ कथित कलाकार थे जो कृष्ण लीला के मंचन के समय तरह-तरह के पैंतरे आजमा कर कृष्ण लीला को बंद करवाने में पूरी ताकत झोंक देते थे। कभी कृष्ण लीला मंचन के लिए जगह की मनाही करवा दी जाती तो कभी ड्रामा में भाग लेने वाली स्क्ूली छात्राओं व उनके परिजनों को भड़काकर उन्हें अपना किरदार अदा करने से रोक लिया जाता। यह सब षडयंत्र जन्माष्टमी के दिन ही रचे जाते थे। कई बार ऐसा भी देखने को मिला कि हुड़दंगियों को दर्शकों की भीड़ में शामिल कर कार्यक्रम को बंद करवाने की साजिशें रची गई। ग्रामीणों को याद हो तो कई बार दर्शकों की भीड़ में पत्थर तक फैंकवाए गए लेकिन षडयंत्रकारियों की कोई योजना सिरे नहीं चढ़ पाई और भगान श्री कृष्ण की यह भव्य लीलाएं लक्ष्मण दास जरगर की अंतिम सांस तक चलती रही।
जानें कौन थे लक्ष्मण दास जरगर और उन्होंने कैसे की अभिनय की शुरूआत
Laxman Dass Jargar most Popoler Acter in Lohari Ragho Ramlila वर्ष 1928 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जिला मुल्तान में जन्मे लक्ष्मन दास जरगर का परिवार बाद में पंजाब प्रांत के ही जिला झांग स्थित गाँव अहमदपुर सियाल में रहने लगा। वर्ष 1940 में जब वे महज 12 वर्ष के थे तो इसी गाँव अहमदपुर सियाल में आयोजित रामलीला में उन्होंने छोटा सा किरदार निभाया था। यह पहला मौका था जब लक्ष्मण दास जरगर ने स्टेज पर अपनी प्रस्तुति दी थी। रामलीला के इस मंच पर इनकी प्रतिभा को विशेष पहचान मिली। पहली ही बार में दर्शकों से तालियों के रूप में मिले बेइंतहा प्यार ने इनके जोश को कई गुना बढ़ा दिया। 1947 तक लगातार 7 साल तक वे पाकिस्तान के इसी गाँव में रामलीला मंचन व अन्य कार्यक्रमों में प्रस्तुति देते रहे। यह उनके अभिनय की खूबी थी कि दर्शक अकसर अन्य कलाकारों के बजाय उन्हें देखना पसंद करते थे। अगस्त 1947 में भारत-पाक विभाजन के उपरांत वे पाकिस्तान से आकर भारतवर्ष के पंजाब प्रांत(वर्तमान में हरियाणा) के जिला हिसार स्थित गाँव लोहारी राघो आकर बस गए।
लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत
History of Lohari Ragho Ramlila Written by Sandeep Kamboj गाँव लोहारी राघो में रामलीला मंचन की शुरूआत का श्रेय भी लक्ष्मण दास जरगर को जाता है। पाकिस्तान से लोहारी राघो में आने के उपरांत वर्ष 1948 में ही उन्होंने रामलीला मंचन के लिए तैयारियां शुरू कर दी थी। मूल रूप से ज्वैलर्स कारोबारी लक्ष्मण दास जरगर ने पाकिस्तान की रामलीला में अपने साथ अभिनय करने वाले साथी कलाकारों हंसराज चांदना व डॉ. बलदेवराज शर्मा आदि की मदद से वर्ष 1949 में रामा क्लब रामलीला लोहारी राघो का गठन कर रामलीला मंचन को हरी झंडी दे दी। लोहारी राघो के इतिहास में यह पहला मौका था जब यहाँ रामलीला का मंचन किया जा रहा था। लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत 23 सितंबर 1949 शुक्रवार के दिन हुई थी और इस साल 1 अक्तूबर 1949 को गाँव में पहली बार दशहरा पर्व के अवसर पर रावण दहन किया गया था। पहली ही बार में लोहारी राघो की रामलीला जबरदस्त हिट साबित हुई। अपनी कॉमेडी से दर्शकों को दीवाना बनाने वाले मनोरंजन के इस बेताज बादशाह का किरदार अन्य कलाकारों पर भारी नजर आया।
अभिनय व निर्देशन के वो 68 साल
अपने जीवन काल के 68 साल तक रामलीला, ड्रामा व अन्य प्रतियोगिताओं आदि में अभिनय व निर्देशन करने वाले लक्ष्मण दास जरगर की मुख्य पहचान हास्य कलाकार की ही रही। भले ही वे रामा कल्ब रामलीला व कृष्ण लीला के डायरेक्टर रहे हों लेकिन लोगों को उनका कॉमेडियन अवतार ही पसंद आया। वर्ष 1949 से वर्ष 1982 तक लगातार 34 साल वे रामलीला के दर्शकोंं को हंसा-हंसा कर लोट-पोट करते रहे। जैसे ही वे स्टेज पर आते पंडाल किलकारियों व तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता। वर्ष 1978 में उन्हें रामा क्लब रामलीला का डायरेक्टर बना दिया गया। रामलीला के अलावा भी वे अनेक तरह की सांस्कृतिक प्रतियोगिताओंं में भी हिस्सा लेते रहते थे।
नंदू नाई व चुवन लाई ड्रामा ने दिलाई पहचान, अनेक बार मिला सम्मान
Lohari Ragho Best Ramlila & Krishan Lila Director Laxman Dass Jargar हास्य के इस जादूगर द्वारा रचित अनेक कोमिक व ड्रामा ने इस कदर धमाल मचाया कि लोग इन्हें देखकर ही हंसने लगते थे। लक्ष्मण दास जरगर द्वारा रचित नंदू नाई व चुवन लाई ड्रामा दर्शकों की पहली पसंद बन गए थे। राजा हरिश्चंद्र व पृथ्वीराज चौहान के ड्रामे में भी इनके किरदार को सराहा गया। इसके अलावा भी उन्होंने अनेक ड्रामा व कोेमिक स्वंय अपनी कलम से लिखे थे। भले ही इस महान कलाकार को लोहारी राघो की ग्राम पंचायत ने कभी सम्मान न दिया हो लेकिन मनोरंजन के इस बेताज बादशाह ने अनेक बार बड़े मंचों पर सम्मान पाकर लोहारी का मस्तक गर्व से ऊंचा किया। सबसे पहले वर्ष 1962 में कुरुक्षेत्र में आयोजित सूर्य ग्रहण मेले के दौरान लक्ष्मण दास जरगर को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण आकाशवाणी पर भी हुआ था। तत्पश्चात वर्ष 1965 में नलवा में आयोजित एक सांस्कृतिक प्रतियोगिता में राजा हरिश्चंद्र ड्रामा को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया था। वहीं वर्ष 1971 में हांसी के मेम वाले बाग में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान एक पंजाबी नज्म ‘उठो-जागो नौजवानों’ की प्रस्तुति पर तत्कालीन एसडीएम द्वारा इन्हें विशेष तौर से सम्मानित किया गया था। जब वे जीवन के अंतिम पड़ाव में थे तो गाँव लोहारी राघो रामलीला कमेटी को उनकी याद आई और वर्ष 2015 की रामलीला के दौरान उनका सम्मान किया गया। गाँव लोहारी राघो में कृष्ण लीला का अंतिम बार मंचन वर्ष 2015 में हुआ। तत्पश्चात लक्ष्मण दास जरगर का स्वास्थ्य खराब हो गया और एक फरवरी 2016 को वे हमेशा के लिए हमारे बीच से चले गए। उनके निधन के साथ ही कृष्ण लीला मंचन की यह अनमोल विरासत पर भी विराम लग गया जिसे जन्माष्टमी के अवसर पर आज भी लोहारी राघो के ग्रामीण याद करते हैं।
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