- क्या आजादी दिवस के अवसर पर गाँव की समस्याओं व विकास पर चर्चा करना गलत है ?
- गाँव के विकास कार्यों में रुकावट डालने वाले कथित जिम्मेदारों का पर्दाफाश करना कितना उचित?
- पिछले 75 साल में गाँव ने क्या खोया-क्या पाया, इस पर मंथन होना चाहिए था या नहीं
- गाँव की समस्याओं और विकास कार्यों की चर्चा गाँव में नहीं तो और कहाँ दिल्ली-लंदन में होगी ?
संदीप कम्बोज
लोहारी राघो। आजादी के 75वें अमृत महोत्सव को इस बार देशभर में धूमधाम व हर्षोल्लास से मनाया गया। 15 अगस्त को राजधानी दिल्ली समेत हर राज्य, गाँव, शहर में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।(Who-got-the-chill-on-Nand-Kishore-Chawla-speech-in-the-LohariRagho-Amrit-Mahotsav-program) इन कार्यक्रमों का मकसद महज तिरंगा फहराने तक ही सीमित नहीं था बल्कि पिछले 75 साल में हमने क्या खोया-क्या पाया, कितना विकास हुआ, कितना अभी बाकी है और तरक्की के इस सफर में हमारे रास्ते में क्या-क्या रकावटें आई और इनसे कैसे पार पाया गया और भविष्य में हमने क्या करना है, इस पर पूरी गंभीरता व गहराई से चिंतन किया गया। इन सब विषयों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रकाश डाला, राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने, जिला, विधानसभा व ब्लॉक स्तर पर स्थानीय विधायकों, सांसदों तथा जनप्रतिनिधियों व अन्य समाजसेवियों ने अपने-अपने जिला व विधानसभा क्षेत्र के विकास, उपलब्ध्यिों का बखान किया और विस्तार से बताया कि इस मुकाम तक पहुंचने में किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ये तो रही राज्य, जिला, तहसील स्तर के कार्यक्रमों की बात लेकिन गाँवों की कहानी इनसे बिल्कुल जुदा है। गाँवों में आजादी दिवस के मौके पर इन सब विषयों पर चर्चा करना बहुत बड़ा अपराध है। जिस भी गाँव में किसी ग्रामीण, नेता या समाजसेवी ने 15 दिवस के अवसर पर गाँव की समस्याओं, विकास व उसमें आने वाली रुकावटों का जिक्र किया तो वो सभी की आंखों में रड़कने लगा। गाँव के विकास में बाधा उत्पन्न करने वालों की पोल खुलने लगी तो वक्ता का यह कहकर विरोध किया गया कि आजादी दिवस के कार्यक्रम में गाँव के विकास कार्याें, समस्याओं व उसमें आने वाली रुकावटों से संबंधित चर्चा करना राजनीति है। क्या गाँव की समस्याओं के असल जिम्मेदारों का मुद्दा उठाने पर वक्ता का विरोध करना जायज है? जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश के विकास में बाधा बने लोगों की पोल खोल सकते हैं, मुख्यमंत्री राज्य स्तर के कार्यक्रमों में राज्य के विकास में बाधा बनी दूसरी राजनीतिक पार्टियों पर दोषारोपण कर सकते हैं, स्थानीय नेता अपने विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों में अपने इलाके के विकास के जिम्मेवारों को दोषी ठहरा सकते हैं तो फिर किसी गाँव के आजादी दिवस कार्यक्रम में उसी गाँव से संबंधित विकास, उपलब्धियों व समस्याओं का मुद्दा क्यों नहीं उठाया जा सकता। क्या आजादी दिवस के अवसर पर गाँव की समस्याओं व विकास पर चर्चा करना और गाँव के विकास कार्यों में रुकावट डालने वाले कथित जिम्मेदारों का पर्दाफाश करना गलत है? आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर पिछले 75 साल में गाँव ने क्या खोया-क्या पाया, इस पर मंथन होना चाहिए था या नहीं? गाँव की समस्याओं और विकास कार्यों की चर्चा यदि संबंधित गाँव में ही नहीं होगी तो और कहाँ दिल्ली-लंदन में होगी? शर्म आती है यह कहते हुए कि 21वीं सदी चल रही है और हम आजादी का 75 वां अमृत महोत्सव मना रहे हैं लेकिन आज भी जिस तरह से हमारे गाँव पिछड़ेपन का शिकार हैं, ठीक वैसे ही गाँवों के लोगों की सोच भी संकीर्ण और पिछड़ी हुई है। गाँवों में आज भी गाँव की समस्याओं, उनमें आने वाली रुकावटों को सार्वजनिक करना बहुत बड़ा अपराध माना जाता है।
गरजते रहे नंद किशोर चावला, सुलगते रहे विरोधी, बजती रही तलियां
15 अगस्त आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर गाँव लोहारी राघो में जो हुआ, वह वास्तव में ही गाँवों के लोगों की संकीर्ण सोच को उजागर करता है। इस वाकये ने पूरी तरह से साबित कर दिया है कि गाँव में जो भी व्यक्ति गाँव के विकास, समस्याओं व उसमें आने वाली रुकावटों और उसके जिम्मेदारों पर चर्चा करेगा, वह उस गाँव का सबसे बड़ा दुश्मन कहलाएगा। गाँव के विकास कार्यों में हुए भ्रष्टाचार और उसे अंजाम देने वालों की पोल खोलेगा तो उस पर राजनीति करने के आरोप लगाए जाएंगे। गाँव के विकास कार्यों में भ्रष्टाचार करने वालों व विकास कार्यों में अड़ंगे डालने वालों की पोल खोलने वाले के खिलाफ ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जाएगा कि पता नहीं उसने कितना बड़ा गाँवद्रोह कर डाला हो। ठीक ऐसा ही माहौल इन दिनों गाँव लोहारी राघो में सर्वजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंद किशोर चावला के खिलाफ बनाया जा रहा है। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय लोहारी राघो में आयोजित अमृत महोत्सव कार्यक्रम के दौरान नंद किशोर चावला ने जब गाँव में अब तक हुए विकास कार्यों, उपलब्धियों का बखान करने के उपरांत जैसे ही गाँव की मुख्य समस्याओं, भ्रष्टाचार, गाँव के विकास कार्यों में रुकावट डालने के जिम्मेवारों की पोल खोलनी शुरु की तो कार्यक्रम में मौजूद कुछ पंचायतियों को यह नागवार गुजरा। एक तरफ नंद किशोर चावला मंच पर गरज रहे थे, और दूसरी तरफ बच्चे तालियों पर तालियां बजा रहे थे।
आखिर क्या कसूर है नंद किशोर चावला का ?
नंद किशोर ने जैसे ही बिना नाम लिए गाँव के विकास कार्यों में रोड़ा डालने वालों की पोल खोलनी शुरु की तो पंडाल तालियों की गड़ग़ड़ाहट से गूंज उठा लेकिन कुछ लोग इस दृश्य को सहन नहीं कर पाए और आग बबूला हो उठे। माहौल में गर्मा-गर्मी आ चुकी थी। मौजूदा पंचायतियों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले व भावी सरपंच पद उम्मीदवारों के रिश्तेदार देसराज कम्बोज से रहा नहीं गया तथा मंच के पास जाकर विरोध जताया तथा मंच से उतर जाने के लिए कहा लेकिन नंद किशोर चावला इतना होने पर भी रुके नहीं और मनरेगा में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा डाला। कुछ पंचायतियों ने तो इस कार्यक्रम का बहिष्कार तक करने का मन बना लिया था लेकिन जैसे-तैसे उन्हें रोका गया। लेकिन बाद में विद्यालय प्राचार्य सतेंद्र नेहरा के आग्रह पर नंद किशोर चावला ने अपना भाषण बीच में ही समाप्त कर दिया। नंद किशोर चावला पूरे मूड में दिखाई दे रहे थे तथा चुन-चुन कर लोहारी राघो के बर्बाद करने वालों पर निशाना साध रहे थे। खैर, जो हुआ सो हुआ। कार्यक्रम भी समाप्त हुआ लेकिन अब जो माहौल बनाया जा रहा है, वह बिल्कुल भी सही नहीं है। यह विरोध का प्रोपगेंडा उन्हीं लोगों का है जो अब तक गाँव के विकास कार्यों में भ्रष्टाचार तथा उसमें विभिन्न तरह से अड़ंगे डालकर रुकावट पैदा करते आ रहे थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गाँव के विकास कार्यों में रोड़ा अटकाने वालों, गाँव के विकास कार्यों में भ्रष्टाचार करने वालों की पोल खोलना गलत है? पंचायतियों द्वारा की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाना गलत है? यदि यह सही है तो नंद किशोर चावला ने आखिर गलत कया किया है , लोहारी राघो के हर ग्रामीण को एक बार इस पर मंथन जरुर करना चाहिए। क्या गाँव की समस्याओं व उसमें रोड़ा अटकाने वालों की पोल खोलना अपराध है? आजादी के अमृत महोत्सव पर आखिर क्यों नहीं होनी चाहिए थी गाँव की समस्याओं, भ्रष्टाचार, अवैध कब्जों व विकास कार्यों में रोड़ा अटकाने वालों पर चर्चा? अब किसी को गाँव की मुख्य समस्याओं पर उठाई गई आवाज गलत लग रही है तो गाँव द्रोही नंद किशोर चावला नहीं बल्कि वही हैं जिनका जमीर या तो हमेशा के लिए मर चुका है या उन लोगों का गुलाम बन बैठा है जो अब तक गाँव लोहारी राघो को लूटते आ रहे हैं और गाँव को भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बना डाला है। खैर, खुशी इस बात की है कि पहली बार किसी ने सार्वजनिक मंच पर उसी गाँव में हुए भ्रष्टाचार, गाँव के विकास कार्यों में रोड़ा अटकाने वालों की पोल खोलने की हिम्मत दिखाई है। काश ! हर गाँव में ऐसा होने लगे तो भविष्य में हमारी पंचायतों में भ्रष्टाचार करने की हिम्मत कोई पंचायती न कर पाए।
-लेखक विलेज ईरा के मुख्य संपादक हैं
नीचे दिए लाल रंग के लिंक पर क्लिक कर सुनें आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय लोहारी राघो में नंद किशोर चावला द्वारा दिया गया पूरा भाषण
https://www.youtube.com/watch?v=4vrHOXnZAbs&feature=share
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