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संदीप कंबोज
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Welcome to Harappa Village लोहारी राघो इतिहास की मिट्टी से लेकर विकास, संस्कृति और एकता का संगम खबरें, विकास और हमारी पहचान अब एक ही मंच पर जो छुपाया जा रहा है वही हम दिखाएंगे हम किसी पार्टी या नेता के गुलाम नहीं हम सिर्फ सत्य और संविधान के साथ

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Welcome to Harappa Village Lohari Ragho : इतिहास की मिट्टी से लेकर विकास, संस्कृति और एकता का संगम। देखें गाँव लोहरी राघो की आधिकारिक वेबसाइट — खबरें, विकास और हमारी पहचान अब एक ही मंच पर

राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा ने लोहारी राघो के ग्रामीणों से वीर हकीकत राय की शहादत को सलाम करने का लिया वादा, जानें आखिर कौन थे वीर हकीकत राय और उन्होंने क्या दिया बलिदान

 

विलेज ईरा न्यूज
हिसार। गाँव लोहारी राघो स्थित अनाज मंडी में आयोजित ग्राम उत्सव कार्यक्रम के दौरान राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा ने ग्रामीणों की सभी मांगें पूरा करने का वादा करने के साथ ही ग्रामीणों से भी एक वादा लिया।   (
Know-what-Rajya-Sabha-MP-Dr-Subhash-Chandra-said-about-Veer-Haqeeqat-Rai-in-village-Lohari-Ragho) डॉ. सुभाष चंद्रा ने गाँव लोहारी राघो के ग्रामीणों से वादा लिया कि वे वीर हकीकत राय द्वारा धर्म की रक्षा के लिए दी गई जीवन की कुर्बानी को कभी नहीं भुलाएंगे तथा उन्हें समय-समय पर याद करेंगे। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि वीर हकीकत राय आखिर हैं कौन? मात्र 14 साल की उम्र में वीर हकीकत राय अपना बलिदान देकर हमेशा के लिए अमर हो गए। वीर हकीकत राय ने अपने धर्म को अपने जीवन से बड़ा माना और धर्म की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी को कुर्बान कर दिया। वीर हकीकत राय का जन्म स्यालकोट के एक धनाढ्य परिवार में हुआ था। वह कुशाग्र बुद्धि के थे। चार-पांच वर्ष की आयु में ही उन्होंने इतिहास और संस्कृत का पर्याप्त अध्‍ययन कर लिया था। उन्हें 10 वर्ष की आयु में फारसी की पढ़ाई के लिए मदरसे में भेजा गया। मदरसे में पढ़ाई के दौरान एक बार उन्हें कक्षा की बागडोर उन्हें संभालने को दी गई। इस पर मदरसे के दूसरे छात्रों ने विरोध कर दिया और वीर हकीकत राय पर धर्म के लेकर तमाम गलत आरोप लगा दिए। बात बढ़ी तो बच्चों के बीच का यह विवाद धर्म की लड़ाई बन गया। मदरसे के जिम्मेदार लोगों ने भी वीर हकीकत राय का पक्ष जानने के बजाए दूसरे बच्चों का पक्ष लिया। यह मामला नगर शासक के पास पहुंचा तो निर्णय सुनाया गया कि बालक अपना धर्म परिवर्तन कर ले अन्यथा इसका वध कर दिया जाएगा। वीर हकीकत राय ने धर्म परिवर्तन के बजाए अपना सिर देना स्वीकार कर लिया। बसंत पंचमी के दिन 14 वर्षीय हकीकत राय को मृत्युदंड दे दिया गया। उनके बलिदान का समाचार सुनकर उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी चिता में कूदकर सती हो गईं। लाहौर के पास वीर हकीकत राय की समाधि बनी हुई है। पढ़ें वीर हकीकत राय की पूरी बलिदान गाथा। बता रहे हैं संदीप कम्बोज

साल था 1742। सारे पंजाब में बसंत झूम कर तो आया था, लेकिन बहारों को न जाने क्या हुआ कि वह लाहौर जरा धीमे-धीमे पहुंची, लेकिन उनसे पहले लाहौर पहुंच गया एक 14 साल का बालक। जिसके हाथ बेड़ियों में जकड़े थे और कमर में जंजीरों से जकड़ कर भारी पत्थर लगाया गया था । लेकिन मजाल क्या कि उस बच्चे की जीभ ने उफ करना भी सीखा हो और पेशानियों ने बल पड़ना जाना हो। इतने में काजी की आवाज गूंजी, बोल ल़ड़के! तुझे इस्लाम राजी है या मौत?  बेड़ियां बंधे हाथ ऊपर उठाते हुए वह बालक गरजा। पहले ये बता, क्या मुसलमानों को मौत नहीं आती। क्या मुसलमान होकर मैं कभी नहीं मरूंगा? काजी ने कहा- मजाक करता है क्या? इतना भी नहीं जानता हर किसी को एक दिन खाक होना है। तब उस लड़के ने फिर चीखते हुए कहा- तो जब ऐसा ही है और मौत तय है तो क्यों में अपना धर्म छोड़ दूं? मैं अभी मर जाऊं और तू कल? लेकिम मौत तो दोनों की ही होगी।

मैं अपना धर्म नहीं बदलूंगा

एक बार फिर पूरे जोश में चीखते हुए उस लड़के ने कहा-मैं अपना धर्म नहीं बदलूंगा। किसी कीमत पर भी नहीं। इतना सुनना था कि काजी के आदेश पर भीड़ ने पत्थर बरसा-बरसा कर उस बच्चे की हत्या कर दी। भीड़ छंट गई तब वासंती हवा ने मैदान में गिरे उसे जिस्म को छुआ और दुनिया भर में इस शहादत का परचम लहरा दिया था, जिस पर लिखा था वीरगति को प्राप्त वीर हकीकत राय।

पंजाब के स्यालकोट में जन्म
हकीकत राय की कहानी शुरू होती है पंजाब के स्यालकोट से। साल 1728 में यहां के व्यापारी बागमल और उनकी पत्नी कौरां के घर एक सुंदर-मनोहर बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया हकीकत। मां उसे ऊपर वाले का आशीर्वाद बताती और अपना सारा प्यार लुटा देती। धीर-धीरे हकीकत बड़ा होने लगा, लेकिन उसके साथ एक अजीब बात होने लगी कि नन्हा सा बालक गीता-पुराण पढ़ने लगा। आश्चर्य कि इस चार साल के बच्चे ने तब तक का सारा इतिहास पढ़ डाला था और पौराणिक कथाएं तो बिल्कुल याद कर ली थीं।

मौलवी के यहां पढ़ने गए हकीकत
इस्लामी शासकों के उस दौर में अफसरी और सरकारी कामकाज की भाषा फारसी थी। इसलिए समाज के साथ कदमताल करने के लिए हकीकत को मौलवी के पास भेजा गया। तालीम में अच्छे हकीकत ने सारे सबक जल्द ही सीख लिए। यह वह समय था जब हिंदुओं को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। मौलवी के यहां पढ़ने वाले अन्य लड़के सनातनी देवी-देवताओं का मजाक बनाया करता थे। एक दिन हकीकत की बहस कुछ मुस्लिम लड़कों से हो गई। उन्होंने मां दुर्गा को अपमानित किया।

सनातन परंपरा का हो रहा था अपमान
इस पर हकीकत ने कहा कि मैं भी अगर आपके धर्म के लोगों पर ऐसी टिप्पणी करूं तो? हकीकत के इस सवाल ने माहौल में सन्नाटा भर दिया। आनन-फानन में हकीकत को बंदी बना लिया गया। मुस्लिम बच्चों ने शोर मचा दिया की इसने बीबी फातिमा को गालिया निकाल कर इस्लाम और मोहम्द का अपमान किया है। इसके बाद हाकिम आदिल बेग के समक्ष हकीकत को पेश किया। आदिल समझ गया कि समझ गया की यह बच्चों का झगड़ा है, मगर मुस्लिम लोग उसे मृत्यु-दण्ड देने की मांग करने लगे।

माता-पिता ने भी हकीकत को समझाया

अपने बेटे को बचाने के लिए पिता बगमाल ने किसी तरह लाहौर में फरियाद करने की मोहलत मांगीं। दो दिन तक चलकर हकीकत और उनके माता-पिता पैदल चलकर लाहौर पहुंचे। पंजाब का नवाब जकरिया खान था। उसके सामने भी हकीकत को मृत्युदंड की मांग की गई और यही विकल्प रखा गया कि हकीकत माफी मांग कर इस्लाम कबूल कर ले। इसके लिए उसके माता-पिता और अन्य सभी ने समझाया लेकिन हकीकत नहीं माना।

2 दिन बैठक के बाद मुकर्रर हुई मौत
तब लाहौर के काजियों ने कहा कि यह इस्लाम का मुजरिम है। इसे आप हमे सौंप दे। हकीकत की सजा क्या हो यह तय करने के लिए दो दिन की बैठक हुई। तब तय किया गया 14 साल के बालक को पत्थर मार-मार कर मौत दे जाए। इसके लिए बकायदे मुनादी कराई गई ताकि लाहौर के लोग अधिक से अधिक पहुंच सकें। अगले दिन हकीकत को कोतवाली के सामने आधा जमीन में गाड़ दिया गया और लोग उस पर पत्थर मारने लगे।

वासंती रुत में याद कीजिए हकीकत का बलिदान
इसी बीच जब हकीकत पत्थर खाते-खाते हकीकत बेहोश हो गए तो जल्लाद ने उनका सिर कलम कर दिया। धर्म परिवर्तन के लिए अपना बलिदान देने वाले हकीकत राय पहले वीर थे। 14 साल की उम्र में उन्होंने त्याग और बलिदानन का मर्म समझ लिया था। उनके बलिदान के बाद लाहौर में उनका समाधि स्थल बनाया गया। वहीं स्यालकोट में भी उनका समाधि स्थल बना दिया गया था। जिसे बाद में तोड़ दिया गया था। लाहौर में आज भी इस बलिदानी की बलिवेदी पर हर बरस मेले सजते हैं। वासंती रुत वाली बसंत पंचमी के दिन जब तेज हवा बहती है तो उनमें कहीं न कहीं वीर हकीकत राय की खिलखिहाट मिली होती है। उन्हें नमन।

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Sandeep Kamboj

Sandeep Kamboj

"मैं संदीप कंबोज, लोहारी राघो की मिट्टी का एक छोटा सा अंश हूँ। मेरा उद्देश्य पत्रकारिता और ब्लॉगिंग के माध्यम से हरियाणा की समृद्ध विरासत, विशेषकर हड़प्पा कालीन इतिहास को जीवंत रखना है। मेरा मानना है कि हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, भविष्य का वृक्ष उतना ही विशाल होगा। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं आपको अपने गाँव के इतिहास, संस्कृति और आधुनिक बदलावों की यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ।"

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