- पढ़ें 1947 लोहारी राघो गदर के दौरान हुए लूटकांड की कहानी, प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी
- आज भी जीवित हैं लूटकांड के समय के प्रत्यक्षदर्शी, सुनाई रुह कंपा देने वाली दास्तान
- सेना के अटैक के बाद लोहारी टूटते ही 19 अक्तूबर की रात पाकिस्तान के लिए प्रस्थान कर गए थे लोहारी राघो के मुसलमान
- गाँव खाली होते ही अगले दो-तीन दिन तक हुई थी जमकर लूटपाट, घरों में बंधी भैंस, गायें, बैल व पशु भी खोल ले गए थे लुटेरे
- डाटा व मसूदपुर के ग्रामीणों से था लोहारी राघो के मुसलमानों का तगड़ा भाईचारा
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| लूटकांड के प्रत्यक्षदर्शी Dhan Singh Saini |
संदीप कम्बोज
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| लूटकांड के प्रत्यक्षदर्शी Banwari Saroha |
लोहारी राघो। जरा कल्पना कीजिए आपको कुछ दिन के लिए अपना घर, गाँव छोड़कर कहीं दूसरी जगह रहने के लिए भेज दिया जाए और जब आप वापिस लौटें तो आपके घर का कीमती सामान, खिड़कियां, दरवाजे तक गायब हों तो आपके जहन पर क्या बीतेगी। Gadar of Lohari Ragho 19 October 1947 निश्चय ही एक बार तो आप भीतर तक टूट जाएंगे। जीवन भर की कठिन मेहनत से कमाई गई पूंजी के लुट जाने पर आप कितने ज्यादा दु:खी और परेशान हो जाएंगे, कैसे अपने आप को व परिजनों को दिलासा देंगे। यह सोचकर ही रुह कांप उठती है। आज से 75 साल पहले कुछ ऐसा ही दर्द झेला था गाँव लोहारी राघो के बाशिंदों ने। वर्ष 1947 में विभाजन के समय मुसलमानों द्वारा गाँव लोहारी राघो को खाली करने के उपरांत पड़ोसी गाँवों के लुटेरों ने गाँव में गुंडागर्दी व बेशर्मी का जो नंगा नाच खेला था, उसे याद कर आज भी प्रत्यक्षदर्शियों की रुह कांप उठती है।History of Lohari Ragho Written by Sandeep Kamboj गाँव के सुनसान घरों पर धावा बोलकर लुटेरों ने न केवल जेवर, नकदी व कीमती सामान लूटा साथ ही घरों से खिड़की, दरवाजे व छतों से शहतीर तक लूट ले गए। लूट का तांडव ऐसा कि जिस लुटेरे के हाथ जो लगा, लूट ले गया। कोई घरों से गाय खोल ले गया तो कोई भैंस, बैल समेत अन्य पशु। इस लूटकांड को अपनी आंखों से देखने वाले प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो लूटपाट में मुुख्यत: सिसाय गाँव के ग्रामीण शामिल थे। इसके अलावा कई अन्य गाँवों के लोग भी उनका साथ दे रहे थे क्योंकि उस समय ब्रिटिश सेना की कार्रवाई के चलते गाँव पूरी तरह से सुनसान था। ब्रिटिश सेना द्वारा गाँव लोहारी राघो पर हमला कर सैकड़ों मुसलमानों को मौत के घाट उतारने के बाद घबराए मुसलमान 19 अक्तूबर 1947 की रात गाँव से खेतों के रास्ते बरवाला के लिए प्रस्थान कर गए थे। ब्रिटिश सेना के अटैक के बाद चहुंओर लोहारी राघो के टूटने का ढ़िंढ़ोरा पिट गया और 20 अक्तूबर 1947 से शुरू हो गया गाँव के घरों में लूटपाट का सिलसिला। क्योंकि मुसलमानों के गाँव छोड़ते ही सेना भी यहाँ से जा चुकी थी। पहले से ही ताक(इंतजार) में बैठे सिसाय गाँव समेत आस-पास के गाँवों के ग्रामीणों ने मुसलमानों व हिंदुओं के घरों पर धावा बोल दिया और सभी पशु गाय, भैंस, बैल आदि सब खोल ले गए। लुटेरों के हाथ जो भी पैसा, जेवर व कीमती सामान आया, सब लूट ले गए। लोहारी राघो निवासी ग्रामीण 98 वर्षीय धन सिंह सैनी के मुताबिक उस समय पड़ौसी गाँवों के लुटेरों ने मुसलमानों के घरों के साथ-साथ हिंदुओं के घरों में भी डाका डाला था। क्योंकि ब्रिटिश सेना के डर से हिंदू परिवार भी लोहारी राघो छोड़कर दूसरे गाँवों में जा चुके थे। वे बताते हैं कि उस समय लोहारी राघो में लूटपाट का इस कदर नंगा नाच हुआ था कि लुटेरे घरों के खिड़कियां, दरवाजे तक उतार ले गए थे। 103 वर्षीय बनवारी लाल सरोहा के मुताबिक पड़ौसी गाँवों के लोग काफी दिनों से इंतजार में थे कि कब यहाँ के मुसलमान गाँव से छोड़कर जाएं और वे घरों में लूटपाट करें। बताते हैं कि ब्रिटिश सेना से पहले लोहारी राघो पर आस-पास के दर्जनभर गाँवों के लुटेरों द्वारा एकजुट होकर जितने भी हमले किए गए थे, सभी का मकसद मुसलमानों को यहाँ से खदेड़कर उनके घरों को लूटना था। लेकिन 8-10 गाँवों के हिंदुओं द्वारा 11 से ज्यादा हमले करने के बावजूद भी वे लोहारी राघो को तोड़ नहीं पाए थे। अंत में सेना को एक्शन लेना पड़ा था। सेना ने गाँव लोहारी राघो पर अटैक कर सैकड़ों मुसलमानों को मौत के घाट उतारा और भय से कांपते बचे मुसलमान रातों-रात गाँव छोड़कर बरवाला की ओर प्रस्थान कर गए थे। ग्रामीण छोटो देवी जांगड़ा व उजाला राम संभरवाल की मानें तो लोहारी राघो में हुई इस लूटपाट में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए कुछ हिंदू कम्बोज परिवारों का भी हाथ था।History of Lohari Ragho Ramlila Written by Sandeep Kamboj वे बताते हैं कि मुसलमानों के गाँव छोड़ने के उपरांत जब पड़ोसी गाँव के लुटेरे मुसलमानों व हिंदुओं के सुनसान घरों से लूटपाट कर रहे थे तो उसी दौरान कम्बोज परिवारों का एक जत्था पाकिस्तान से लोहारी राघो पहुंचा था। उनके मुताबिक उन्होंने भी गाँव को सुनसान पाकर कई घरों में लूटपाट की थी जिस पर बाद में कई बार विवाद भी हुआ।
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| लूटकांड के प्रत्यक्षदर्शी Ujala Ram Sambhrwal @ 1947 |
गाँव डाटा में मिला था छोटो देवी के घर से लूटा गया सामान !
Lohari Ragho Chhoto Devi's Story at 1947, 19 अक्तूबर 1947 । 98 वर्षीय छोटो देवी जांगड़ा बताती हैं कि मुसलमानों को गाँव से निकालने के लिए ब्रिटिश सेना द्वारा जो एक्शन लिया गया था, उससे करीब दो माह पहले ही वे लोहारी से अपने मायका गाँव सिसाय चली गई थी। जब वे लौटकर लोहारी आई तो उनके घर में भी सब कुछ लुट चुका था। घर के बर्तन, संदूख, बिस्तर समेत सारा कीमती सामान गायब था। वे पूरे दावे के साथ बताती हैं कि उनके घर से लूटा गया सामान गाँव डाटा में देखा गया था और वहां लुटेरों द्वारा उसकी बोली लगाई गई थी। वे बताती हैं कि मुसलमानों के जाने के बाद लुटेरों ने लोहारी राघो में जमकर उत्पात मचाया था। बता दें कि छोटो देवी गाँव सिसाय निवासी उदय सिंह जांगड़ा की बेटी हैं। आजादी से दो साल पहले वर्ष 1945 में छोटो देवी का विवाह गाँव लोहारी राघो निवासी रामजीलाल के बेटे दीवान सिंह जांगड़ा के साथ हुआ था। इनकी दो बेटियां हैं एक अंगूरी जांगड़ा जो अध्यापिका हैं तथा वर्तमान में जिला जींद के गाँव रामराय में रह रही हैं जबकि दूसरी बेटी ओमपति का विवाह हिसार के गाँव माजरा में हुआ है। इनके पति दीवान सिंह जांगड़ा का विभाजन के कुछ वर्ष पश्चात ही निधन हो गया। Gadar of Lohari Ragho 19 October 1947
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| Gadar of Lohari Ragho 19 October 1947 |
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