- विकास की राह में राजनीति का रोड़ा : 11 साल की घोषणा, 11 साल की राजनीति और विकास फिर शून्य
- किसानों ने जमीन देने की सहमति दी, सरकार ने विकास देने से इनकार कर दिया
Hisar Jind Highway Link Route 4 Rakhigarhi Project Cancelled Haryana
संदीप कम्बोज
हिसार-जींद हाईवे लिंक रूट-4 परियोजना का रद्द होना हरियाणा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। Hisar Jind Highway Link Route 4 Rakhigarhi Project Cancelled Haryana यह परियोजना केवल एक सड़क नहीं थी, बल्कि यह क्षेत्रीय विकास, पर्यटन, व्यापार और रोजगार का बहुआयामी आधार बनने वाली थी। यह केवल एक सड़क योजना का ठप होना नहीं है, बल्कि यह हरियाणा की विकास नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह परियोजना केवल एक सड़क नहीं थी, बल्कि यह राखीगढ़ी जैसे विश्व धरोहर स्थल को आधुनिक बुनियादी ढांचे से जोड़ने की एक ऐतिहासिक पहल थी। जब 7 मई 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने नारनौंद रैली में इस सड़क की घोषणा की थी, तो इलाके के लाखों लोगों ने इसे अपने भविष्य की सड़क माना था। यह मार्ग हिसार, जींद और राखीगढ़ी को सीधे जोड़ता, जिससे क्षेत्र का आर्थिक नक्शा पूरी तरह बदल सकता था। मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा से क्षेत्र के लाखों लोगों में उम्मीद जगी थी कि उनका इलाका विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। 2019 में बजट मंजूर हुआ, सर्वे हुआ, किसानों का डेटा पोर्टल पर अपलोड हुआ और भूमि अधिग्रहण की सहमति भी मिल गई। इसके बावजूद 11 वर्षों में सरकार इस परियोजना को जमीन पर उतारने में असफल रही। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब योजना, बजट और प्रशासनिक मंजूरी सब कुछ मौजूद था, तो फिर सड़क क्यों नहीं बनी? इसका जवाब राजनीति के गलियारों में छिपा है। सूत्रों के अनुसार, कुछ नेताओं और उनके प्रभावशाली समर्थकों ने राजनीतिक श्रेय की होड़ में इस परियोजना को आगे बढ़ने से रोका। विकास के बजाय व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी गई। यह वही मानसिकता है जो लोकतंत्र में जनता की आकांक्षाओं को सत्ता की राजनीति के नीचे कुचल देती है। राखीगढ़ी, जो सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे बड़े स्थलों में से एक है, उसे हिसार एयरपोर्ट और जींद से सीधे जोड़ने वाली यह सड़क पर्यटन, व्यापार और रोजगार के नए अवसर खोल सकती थी। राखीगढ़ी को हिसार एयरपोर्ट से जोड़ने वाला यह हाईवे न केवल पर्यटन को नई उड़ान देता, बल्कि क्षेत्र में रोजगार, व्यापार और रियल एस्टेट विकास की नई संभावनाएं खोलता। लेकिन आज विकास की इस संभावना को राजनीति के दलदल में धकेल दिया गया है। इससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलती और हजारों युवाओं को रोजगार मिलता। लेकिन परियोजना के रद्द होने से न केवल किसानों और ग्रामीणों की उम्मीदें टूटी हैं, बल्कि राज्य सरकार की विकास नीति की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ गई है। लोकतंत्र में विकास योजनाओं का मूल्यांकन राजनीतिक लाभ से नहीं, बल्कि जनहित से होना चाहिए। अगर सरकारें योजनाओं को केवल इसलिए रोक दें कि श्रेय किसी और को न मिल जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। अब यह जनता, नागरिक समाज और मीडिया की जिम्मेदारी है कि वे इस फैसले पर सरकार से जवाबदेही मांगें। क्योंकि सड़कें केवल पत्थर और डामर से नहीं बनतीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से बनती हैं। राखीगढ़ी जैसे विश्व धरोहर स्थल को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ना केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं थी, बल्कि यह हरियाणा और देश के पर्यटन, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा सवाल था। लेकिन दुर्भाग्यवश, यह परियोजना सत्ता की कुर्सी, श्रेय की राजनीति और आपसी खींचतान की भेंट चढ़ गई। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन विकास की योजनाएं पीढ़ियों को प्रभावित करती हैं। यदि 2016 में घोषित परियोजना को 2026 में राजनीतिक कारणों से रद्द किया जाता है, तो यह शासन प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। किसानों ने जमीन देने की सहमति दी, बजट मंजूर हुआ, सर्वे पूरा हुआ, फिर भी काम शुरू नहीं हो पाया—यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और राजनीतिक द्वेष का स्पष्ट प्रमाण है। लोकतंत्र में सत्ता जनता के लिए होती है, न कि सत्ता के लिए जनता। यदि विकास योजनाएं केवल इसलिए रोकी जाएं कि श्रेय किसी और को न मिल जाए, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का अपमान है। अब समय आ गया है कि जनता अपने अधिकारों के लिए सवाल उठाए और सत्ता से जवाब मांगे। क्योंकि अगर सड़कें राजनीति की भेंट चढ़ती रहीं, तो विकास केवल घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा।
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श्रेय की लड़ाई में फिर हारी जनता, सड़क नहीं बनी, राजनीति जरूर दौड़ गई
राजनीति में श्रेय लेना अक्सर विकास से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यही इस परियोजना के साथ हुआ। जब सर्वजन समाज पार्टी के अध्यक्ष नंद किशोर चावला ने सबसे पहले इस परियोजना की मांग उठाई, तो यह मुद्दा क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र बन गया। बाद में सरकार ने बजट मंजूर किया, सर्वे कराया और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। लेकिन परियोजना को धरातल पर उतारने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी स्पष्ट दिखाई दी। सूत्र बताते हैं कि कुछ स्थानीय नेताओं ने इस परियोजना को इसलिए आगे नहीं बढ़ने दिया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इसका श्रेय किसी अन्य राजनीतिक दल या नेता को मिले।
प्रशासनिक विफलता या राजनीतिक साजिश?
यह सवाल अब हर नागरिक के मन में है कि क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या राजनीतिक साजिश? जब सर्वे पूरा हो चुका था, बजट जारी हो चुका था और किसानों ने जमीन देने की सहमति दे दी थी, तो फिर निर्माण क्यों नहीं शुरू हुआ? पांच वर्षों में मात्र 60 एकड़ भूमि अधिग्रहण न कर पाना सरकार की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि या तो सरकार में इच्छाशक्ति की कमी थी या राजनीतिक दबावों के कारण परियोजना को जानबूझकर रोका गया।
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राजनीति की भेंट चढ़ा विकास का हाईवे
राखीगढ़ी केवल हरियाणा ही नहीं, बल्कि भारत और विश्व के लिए एक ऐतिहासिक स्थल है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल माना जाता है और इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। इस स्थल को हिसार एयरपोर्ट और प्रमुख शहरों से जोड़ने वाली सड़क परियोजना भारत के पर्यटन नक्शे पर हरियाणा को नई पहचान दिला सकती थी। विदेशी पर्यटकों, शोधकतार्ओं और इतिहास प्रेमियों की संख्या में भारी वृद्धि हो सकती थी। लेकिन सड़क के अभाव में आज भी राखीगढ़ी तक पहुंचना कठिन है। पर्यटकों को कई बार बस बदलनी पड़ती है और सीधा मार्ग न होने के कारण पर्यटन की संभावनाएं सीमित रह जाती हैं।
आर्थिक विकास का छूटा मौका
हाईवे बनने से केवल यात्रा आसान नहीं होती, बल्कि आर्थिक गतिविधियां भी तेज होती हैं। हाईवे के किनारे होटल, ढाबे, ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउस, औद्योगिक इकाइयां और व्यापारिक केंद्र विकसित होते हैं। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती। भूमि की कीमतों में वृद्धि होती, जिससे किसानों की संपत्ति का मूल्य बढ़ता। लेकिन परियोजना के रद्द होने से यह अवसर भी हाथ से निकल गया।
किसानों का विश्वास टूटता हुआ
किसानों ने कलेक्टर रेट पर भूमि देने की सहमति दी थी। उन्होंने सरकार पर भरोसा किया था कि उनकी जमीन का उचित मुआवजा मिलेगा और क्षेत्र का विकास होगा। लेकिन वर्षों तक प्रक्रिया लटकी रही और अंतत: परियोजना ही रद्द कर दी गई। इससे किसानों का सरकार पर भरोसा कमजोर हुआ है।
लोकतंत्र में जवाबदेही का सवाल
लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। विकास योजनाओं को राजनीतिक स्वार्थों की बलि चढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यदि सरकारें परियोजनाओं को केवल राजनीतिक श्रेय के आधार पर लागू या रद्द करेंगी, तो जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ सकता है।
भविष्य की राजनीति और जनता की भूमिका
इस परियोजना का रद्द होना आगामी विधानसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस फैसले को लेकर आक्रोश है और जनता सरकार से जवाब मांग रही है। यह समय है जब नागरिकों को राजनीतिक दलों से विकास का स्पष्ट रोडमैप मांगना चाहिए। घोषणाओं से अधिक जरूरी है योजनाओं का क्रियान्वयन।
परियोजना पर एक नजर
परियोजना नाम: हिसार-जींद लिंक हाईवे रूट-4
मार्ग : मसूदपुर,डाटा,लोहारी राघो, राखीगढ़ी
घोषणा: 7 मई 2016
बजट स्वीकृति: 21 जनवरी 2019
अनुमानित लागत: 100 करोड़ रुपये
दूरी में कमी: लगभग 20 किमी
स्थिति: 14 जनवरी 2026 में रद्द
सड़कें केवल पत्थर से नहीं बनतीं
सड़कें केवल पत्थर और डामर से नहीं बनतीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता और जनहित की भावना से बनती हैं। हिसार-जींद हाईवे परियोजना का रद्द होना हरियाणा के विकास इतिहास में एक चूका हुआ अवसर है। अगर भविष्य में सरकारें विकास को राजनीति से ऊपर नहीं रखेंगी, तो ऐसे अवसर बार-बार हाथ से निकलते रहेंगे। जनता को अब यह तय करना होगा कि वह घोषणाओं की राजनीति चाहती है या वास्तविक विकास की राजनीति।
संदीप कम्बोज
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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