- अवैध कब्जों की वजह से सिमटकर 50 फीसद से भी कम रह गया गाँव के जोहड़ों का दायरा
- कब्जाधारकों ने मिटा डाला बस स्टैंड वाली ड्रेन का नामोनिशान
- अगर 4-5 दिन लगातार हुई बरसात तो पूरे गाँव का डूबना तय
- भविष्य में गांव कोे डूबने से बचाना है तोे ग्रामीणों को समय रहते जोहड़ों से छुड़वाने होंगे अवैध कब्जे
हिसार/लोहारी राघो। जोहड़ों व ड्रेेेेनों पर अवैध कब्जों का नतीजा क्या होता है,यह देखना है तो जिला हिसार के उपमंडल नारनौंद अंतर्गत आने वाले गाँव लोहारी राघो चले आईए। गाँव के चारों और चक्कर लगाईए, जहाँ तक नजर जाएगी दिखाई देगा तो सिर्फ पानी ही पानी, बाढ़ में डूबे दर्जनों घर और अस्त-व्यस्त जन-जीवन। कब्जाधारी डकैतों ने गाँव के जोहड़ों पर इस कदर कुंडली मार ली है कि आज वे महज चंद घंटे की बरसात भी नहीं झेल पाए। जोहड़ों से ओवरफ्लो हुआ पानी गाँव की सड़कों पर इस कदर बहने लगा मानो कोई दरिया बह रहा हो। जोहड़ों के आस-पास स्थित कई मोहल्लों व घरों में पानी भरी गया। सबसे ज्यादा विकट स्थिति हांसी वाले जोहड़ पर देखने को मिली। गौर करने वाली बात यह है कि महज छोटी सी बरसात ने गाँव लोहारी राघो को किस तरह से पानी-पानी कर डाला, अगर यही बरसात 4-5 दिन तक न थमी तो गाँव का क्या हाल होगा। गाँव को पूरी तरह से डूबने से फिर कोई नहीं बचा सकता। मामूली सी बरसात से उपजे इन हालातों के लिए अगर सीधे तौर पर कोई जिम्मेदार है तो वे हैं जोहड़ों को लूटने वाले डकैत। साथ ही साथ इन जोहड़ माफियाओं कोे शह देने वाले पंच-सरपंच, नंबरदार, प्रशासन व नेता भी उतने ही जिम्मेदार हैं क्योंकि इनहीं के आशीर्वाद और संरक्षण से ही पंचायती जमीन व जोहड़ों पर अवैध कब्जों जैसी गुंडागर्दी को अंजाम दिया जा रहा है। इसके अलावा कब्जाधारकों ने बस स्टैंड वाली ड्रेन पर अवैध कब्जे कर इस ड्रेन का पूरी तरह से नामोनिशान ही मिटा डाला है जो आज लोहारी राघो में बाढ़ जैसे हालात का असल जिम्मेदार है। वर्ष 1997 में आई प्रचंंड बाढ़ के वक्त इसी ड्रेन ने लोहारी को डूबने से बचाया था।
अवैध कब्जों की वजह से आज गाँव के जोहड़ों का दायरा सिमटकर 50 फीसद से भी कम रह गया है। जोहड़ कब्जाने वाले डकैतों का अवैध कब्जे का जो तरीका है, वह भी हैरान कर देने वाला है। जोहड़ों व पंचायती जमीन पर अवैध कब्जा कोई एक-दो दिन में नहीं हो जाता। इसके लिए कब्जाधारक पूरी प्लानिंग करते हैं। जोहड़ों किनारे बसे ये अवैध कब्जाधारक कब्जे के दायरे का साल-दर-साल विस्तार करते रहते हैं। सबसे पहले ये डकैत जोहड़ किनारे मिट्टी आदि डालकर समतल करते हैं। तत्पश्चात कब्जा करने वाली जगह पर गोबर या लकड़ियां आदि डाली जाती हैं। और साल-दो साल बाद इस जगह एक अस्थाई दीवार बनाई जाती है यानि सिर्फ नींव भरकर साधारण तारबंदी कर दी जाती है। उसके बाद जब पंचायतियों व नंबरदारों से ग्रीन सिग्नल मिलने के उपरांत पक्की दीवार कर दी जाती है। हर साल करीब जोहड़ों की 4-5 प्रतिशत जमीन कब्जाई जा रही है लेकिन ग्राम पंचायत व प्रशासन चादर तानकर गहरी नींद में सोए हैं। ग्रामीण यदि चाहते हैं कि जो आज मामूली सी बरसात में हालत गाँव की हुई है, भविष्य में ऐसा न हो तो जल्द से जल्द गाँवों के जोहड़ों से अवैध अतिक्रमण हटवाने के लिए बिना किसी भेदभाव के एक्शन प्लान तैयार करना होगाा।
अब सवाल उठता है कि जब जोहड़ों पर अवैध कब्जे हो रहे होते हैं तो उस समय ग्राम पंचायत, पंच-सरपंच, नंबरदार या अपने आप को गाँव का चौधरी कहने वाले कहाँ सो रहे होते हैं। जब ये अस्थाई तौर पर गोबर, लकड़ियां आदि डालकर कब्जे की शुरुआत करते हैं, इन्हें उसी समय क्यों नहीं रोका जाता। क्या इन दिनों में वहां से कोई पंचायती नहीं गुजरा। देखते सभी हैं लेकिन जान-बूझकर अनदेखा किया जाता है। क्योंकि अधिकतर पंचायती, पूर्व पंचायती व नंबरदार खुद जोहड़ व पंचायती जमीन लूटने वाले डकैत हैं। उन्होंने खुद जोहड़ों व पंचायती जमीन पर अवैध कब्जे किए हैं तो वे दूसरों को भला कैसे रोक सकते हैं।

जोहड़, ड्रेन कब्जाने वालोंं के खिलाफ कार्रवाई को एकजुट हों ग्रामीण
सबसे पहले गाँव के इमानदार व साफ छवि के लोग जो वास्तव में चाहते हैं कि गाँव में कोई सुधार हो वही आगे आएं एक्शन प्लान बनाते समय यह कदापि न देखा जाए कि फ्लां कब्जाधारक मेरा परिजन, यार-रिश्तेदार, जाति से या दोस्त, परीचित है। अवैध कब्जाधारकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए इस तरह के भाई-भतीजावाद व भाईचारे को दरकिनार करना होगा तब कहीं जाकर जोहड़, ड्रेनों व पंचायती जमीन कब्जाने वाले डकैतों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
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