
संदीप कम्बोज
हिसार/लोहारी राघो। कोई गाँव किस तरह से नेताओं व उनके वर्करों की गंदी राजनीति का शिकार होकर बर्बाद होता है, इसकी जीती जागती तस्वीर देखनी है तो जल्द से जल्द जिला हिसार के उपमंडल नारनौंद के गाँव लोहारी राघो चले आएं।(If-you-want-to-see-a-sample-of-development-and-dirty-politics-floating-in-the-water-then-go-fast-Lohari-Ragho) यहाँ आप देख पाएंगे कि गाँव में किस कदर विकास झूम-झूम कर तैर रहा है। गाँव के चारों तरफ पानी ही पानी है। सैकड़ों घर व सैकड़ों एकड़ खेत जलमग्न हो चुके हैं। दृश्य देख ऐसा लग रहा है मानों बाढ़ रुपी दुश्मन ने गाँव को चहुुं ओर से घेर लिया हो और आक्रमण की तैयारी हो। यह सब महज चंद घंटे की बरसात में हुआ है। अगर बरसात दो-चार दिन न थमी होती तो गाँव को डूबने से कोई नहीं बचा सकता था। नारनौंद के मौजूदा विधायक, पूर्व विधायकों व सांसद समेत हल्का नारनौंद के सभी नेताओं को गाँव लोहारी राघो का खुला न्यौता है कि वे एक बार लोहारी राघो जरुर पधारें और यहाँ बाढ़ के पानी में बड़ी शान से तैरता हुआ विकास अपनी आंखों से देखें। तब जाकर समझ में आएगा कि लोहारी राघो अब तक कितनी घटिया व गंदी राजनीति का शिकार रहा है। राजनेताओं ने इस गाँव की किस कदर अनदेखी की है, मौजूदा हालात यह बता देने के लिए काफी हैं। गाँव के पंचायतियों, पंच-सरपंचों, नंबरदारों व इलाके के कुछ राजनेताओं के संरक्षण में गाँव के जोहड़ों व ड्रेनों पर बेखौफ होकर अवैध कब्जे किए गए हैं जिसकी वजह से जोहड़ों का दायरा सिमटकर आधा रह गया और मामूली सी बरसात में ही पानी ओवरफ्लो होकर सड़कों पर दरिया की मानिंद बहने लगा। हद तो तब होती है जब अवैध कब्जाधारी खुद पंचायती हैं जिनमें कई पूर्व पंच-सरपंच व नंबरदार भी डंके की चोट पर जोहड़ों व पंचायती जमीन पर कब्जे जमाए बैठे हैं। गाँव में मौजूद नेताओं के वर्करों, पंचायतियों व मौजिज लोगों का ध्यान गाँव के विकास पर बिल्कुल भी नहीं रहा, अगर होता तो बरसात से पहले ही जोहड़ों व ड्रेनों की खुदाई करवा ली गई होती। गाँव के सार्वजनिक कामों से भी किसी नेता के करीबि को कोई लेना-देना कभी रहा ही नहीं, वरना आज लोहारी राघो अपनी बदहाली पर इस कदर आंसू न बहा रहा होता। राजनेताओं के वर्करोंं द्वारा नेताओं से नजदीकी का फायदा अपने घर,परिवार, रिश्तेदारों, चापलूसों को सरकारी व ठेके की नौकरियां लगवाने, सरकारी ठेके लेने समेत अन्य निजी हितों में इस्तेमाल किया जाता रहा। इलाके के नेताओं ने भी सार्वजनिक कामों में कोई रुचि नहीं ली और अपने वर्करों के निजी काम करके उन्हें खुश करने में जुटे रहे। नतीजन गाँव के विकास कार्यों पर बिल्कुल ब्रेक लग गया जिसका ताजा नमूना आप सबके सामने है। यदि जोहड़ों व ड्रेनों से अवैध कब्जे छुड़वाकर इनकी समय रहते सफाई कर ली जाती तो आज गाँव की तस्वीर कुछ और होती। न सैकड़ों घर व खेत डूबते और कब्जाधारकों से छुड़वाई पंचायती जमीन पर विकास कार्य रफ्तार पकड़ते, सो अलग।
जानें नेताओं के वर्करों ने कैसे डूबोई लोहारी की लुटिया
गाँव की इस दुर्दशा के लिए ग्राम पंचायत का भ्रष्टाचार और ऊपर से नेताओं के संरक्षण के साथ-साथ लोहारी राघो में मौजूद नेताओं के वर्करों की गंदी व खुदगर्ज राजनीति जिम्मेदार है। अलग-अलग नेताओं के वर्करों ने अपने निजी स्वार्थ में गाँव का इस कदर नुकसान किया है कि आज गाँव लोहारी राघो को मिलने वाले विकास प्रोजेक्ट पड़ौसी गाँवों में स्थानांतरित हो चुके हैं। लोहारी की राजनीति पर नजर दौड़ाई जाए तो यहाँ येन-केन-प्रकारेण हर कोई अपना उल्लु साधने में जुटा है। नहीं यकिन तो अलग-अलग नेताओं के करीबियों व वर्करों की कुंडली खंगालकर पता लगाया जा सकता है कि फ्लां-फ्लां नेता के फ्लां-फ्लां वर्कर ने अपने घरों-परिवारों, रिश्तेदारों के लिए क्या निजी फायदे लिए हैं और गाँव के सार्वजनिक/सांझे क्या-क्या कार्य करवाए हैं। अब तक रहे पूर्व विधायकों के लगभग सभी वर्करों ने खुद भी बड़े स्तर पर निजी लाभ लिए हैं और अपने परिजनों, रिश्तेदारों, चेले-चापलूसों को भी सरकारी ठेके व नौकरियां आदि दिलवाई हैं। पिछले 10 साल में गाँव के हिस्से आए कस्तूरबा विद्यालय, आईटीआई, कॉलेज, ग्राम सचिवालय जैसे प्रोजेक्ट नेताओं के वर्करों की घटिया खुदगर्ज राजनीति की बदौलत ही दूसरे गाँवों को ट्रांस्फर कर दिए गए। क्योंकि विकास कार्य को पास करवाने वाला नेता कोई होता है ,लेकिन उसमें टांग अड़ाकर उन्हें रुकवाने वाला वर्कर दूसरे नेता का, जिसका सारा नुकसान गाँव उठाता आ रहा है। कुल मिलाकर अलग-अलग नेताओं के ये वर्कर अपने निजी स्वार्थ में इस कदर अंधे हो चुके हैं कि इनहें गाँव का हित आज तक बिल्कुल भी नजर नहीं आया। काम रुकवाने के पीछे ये अपने नेता को बोलते हैं और कहा जाता है कि इस काम को जैसे भी करके रुकवाया जाए, नहीं तो काम आप करवाओगे इसका लाभ दूसरा नेता ले जाएगा लेकिन इसके पीछे होता इनका खुद का स्वार्थ है कि इन्हें निजी फायदा नहीं मिल रहा होता।
नेताओं के वर्कर बताएं पिछले 25 साल में क्या करवाया लोहारी का विकास ?
8 हजार की आबादी और 5 हजार मतदाताओं वाला लोहारी राघो आज पूरी तरह से अनाथ हो चुका है। न यहाँ ग्राम सचिवालय है, न आईटीआई, कॉलेज और न ही कोई बड़ा स्वास्थ्य या पर्यटन स्थल। यहाँ के विधायकों ने अपने वर्करों के अलावा यदि ग्रामीणों की बात सुनी होती तो गाँव का नक्शा आज कुछ ओर होता। आज तक हर विधायक व नेता ने गाँव लोहारी राघो को सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक समझा है। गाँव के लोग पूछना चाहते हैं कि आखिर लोहारी राघो से भेदभाव की वजह क्या है? करीब 8 हजार आबादी व 5 हजार मतदाताओं वाले इस गाँव को हर बार विकास के नाम पर झुनझुना क्यों थमाया जा रहा है। वर्ष 1996 में विधायक चौधरी जसवंत सिंह के कार्यकाल के बाद के विधायकों ने लोहारी राघो को इस कदर लावारिस बनाकर छोड़ दिया है जैसे यहां कोई इंसान ही न बसते हों। क्या अलग-अलग नेताओं के वर्कर बता सकते हैं कि उनके नेताओं ने अपने वर्करों के परिजनों, रिश्तेदारों को नौकरियों लगवाने के सिवाय गाँव लोहारी के लिए क्या किया है?
1998 के बाद से लावारिस है लोहारी राघो, किसी भी विधायक व नेता ने नहीं ली सुध
1998 के बाद किसी भी विधायक/सांसद ने गाँव लोहारी राघो की कोई सुध नहीं ली है नतीजन यहाँ विकास कार्यों पर पूरी तरह से ब्रेक लगा है जिसकी झलक आज आप गाँव में देख पा रहे हैं। तत्कालीन बिजली मंत्री चौ. जसवंत सिंह द्वारा वर्ष 1998 में राजकीय विद्यालय के 10+2 तक अपग्रेड किए जाने, अनाज मंडी व बाईपास निर्माण के बाद आज तक गाँव में ऐसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं आया जिसे किसी विधायक, सांसद द्वारा लोहारी को दी बड़ी सौगात मान लिया जाए। वर्ष 2000 के बाद प्रो. रामभगत, रामकुमार गौतम, सरोज मोर, पूर्व वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में रामकुमार गौतम दोबारा से विधायक चुने गए हैं लेकिन इन 22 सालों में लोहारी में कोई एक बड़ा विकास कार्य ऐसा नहीं हुआ जो कि गाँव के लिए बड़ी उपलब्धि हो। गाँव को न शिक्षा व खेलों के क्षेत्र में कोई प्रोजेक्ट मिला और न ही स्वास्थ्य या किसी अन्य क्षेत्र में। लोहारी को अब तक मिलता आया है तो सिर्फ और सिर्फ झूठी घोषणाओं का झुनझुना। ऐसा तब है जब गाँव लोहारी राघो निवासी व यहाँ के पूर्व सरपंच विनोद भ्याना हांसी से दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। वर्ष 2009 में जब वे पहली बार हांसी से विधायक चुने गए थे तो उस समय मुख्य संसदीय सचिव भी रहे थे। और अब वर्ष 2019 से वे दूसरी बार हांसी के विधायक चुने गए हैं। लेकिन विनोद भ्याना भी आज तक अपने पैतृक गाँव लोहारी राघो के लिए ऐसा कुछ नहीं कर पाए जिससे कि गाँव उन्नति कर पाता। विनोद भ्याना ने गाँव लोहरी राघो के लिए हुड्डा कार्यकाल में महज एक सड़क पास करवाई थी जिसकी ग्रांट 1 करोड़ रुपए मंजूर की गई थी। आरोप हैं कि इस ग्रांट को भी गाँव के तत्कालीन सरपंच व अफसर मिलकर डकार गए। बताया जाता है कि राजकीय स्कूल से गुरमुख ढ़ींगड़ा की चक्की तक जिस सड़क के नाम पर यह ग्रांट मंजूर की गई थी, वह पहले से ही सही अवस्था में थी। इसके अलावा ग्रामीणों को कोई ऐसा बड़ा सार्वजनिक काम याद नहीं आ रहा है जो विधायक विनोद भ्याना ने लोहारी राघो के लिए किया हो।
पूर्व वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु व उनके वर्कर बताएं कहाँ गया लोहारी राघो में 1.10 करोड़ से बनने वाला हर्बल पार्क
पूर्व वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने वर्ष 2014 में चुनाव जीतने के उपरांत गाँव लोहारी राघो के ग्रामीणों से वादा किया था कि वे गाँव में पर्यटन की दृष्टि से ऐसा पार्क बनाएंगे जिसे देखने दूर-दूर से लोग आया करेंगे। लेकिन चुनाव जीतने के उपरांत वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले तक कैप्टन अभिमन्यु ने गाँव की तरफ झांक कर भी नहीं देखा। जब चुनाव आया तो एक माह पहले लोहारी राघो में हर्बल पार्क बनाने की घोषणा की गई जिसके लिए 1.10 करोड़ रुपए भी मंजूर किए गए थे लेकिन आज 5 साल बाद भी न ही तो हर्बल पार्क बन पाया है और यह बताने वाला कोई नहीं है कि आखिर यह कब तक बनेगा और बनेगा भी या नहीं? इस सवाल का जवाब पूर्व वित्तमंत्री के वर्करों को या खुद उन्हें देना होगा ताकि गाँव के लोगों को वास्तविकता का पता चले कि आखिर वो पैसा कहाँ गायब हो चुका है।
डाटा को मिला 300 करोड़ का आयल डिपो, लोहारी को झुनझुना : कहीं जातिगत राजनीति का शिकार तो नहीं लोहारी राघो?
लोहारी राघो के आस-पास के गाँवों पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि सभी गाँव विकासशील हैं तथा उन्नति के पथ पर अग्रसर हैं लेकिन लोहारी ही एकमात्र ऐसा गाँव है जो घोर पिछड़ेपन का शिकार रहा है। नारनौंद हल्के की गंदी व जातिगत राजनीति ने गाँव लोहारी राघो को छला है। चौधरी जसवंत सिंह को छोड़कर अब तक कोई भी पूर्व विधायक रहा हो, हर किसी ने लोहारी राघो के साथ भेदभाव किया है। पूर्व वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु के कार्यकाल में पड़ौसी गाँव डाटा, मसूदपुर, राखी, मोठ, हैबतपुर, गढ़ी समेत अनेक गाँवों में विकास कार्यों ने रफ्तार पकड़ी लेकिन लोहारी राघो की जमकर अनदेखी की गई। डाटा गाँव को ही देख लिजिए, वित्त मंत्री महोदय ने जाट वोटरों को साधने के लिए वहाँ विकास की गंगा बहा दी। 300 करोड़ का आयल डिपो, राजकीय कॉलेज, पीएचसी समेत अनेक प्रोजेक्ट डाटा को दिए गए लेकिन लोहारी देखता ही रह गया। लोहारी राघो के लोगों की मानें तो उनके गाँव के साथ यह धोखा इसलिए किया जाता रहा है क्योंकि यह पंजाबी बाहुल्य गाँव है और आज तक नारनौंद में कोई पंजाबी विधायक नहीं चुना गया है। ग्रामीणों का मानना है कि नेताओं की जातिगत राजनीति लोहारी पर भारी पड़ रही है। इस हिसाब से तो लोहारी में कभी भी विकास नहीं हो पाएगा। न कभी पंजाबी विधायक चुना जाएगा, न ही यहाँ विकास होगा। नेताओं को लोहारी से 5 किमी दूर आगे के गाँव तो दिखाई दे जाते हैं लेकिन रास्ते में पड़ने वाले लोहारी पर उनकी नजर नहीं पड़ती। यह सरासर लोहारी के लोगों के साथ नेताओं का बहुत बड़ा धोखा है। लोहारी राघो के ग्रामीणों का कहना है कि जन प्रतिनिधि को जाति के आधार पर भेदभाव शोभा नहीं देता। ग्रामीणों ने हल्के के नेताओं से उम्मीद जताई है कि भविष्य में लोहारी राघो को कोई जाति के चश्मे से न देखकर उनके यहाँ भी समान विकास करवाएं और फिलहाल गाँव में जो बाढ़ जैसे हालात बने हैं, उससे निपटने में ग्रामीणों की मदद करें। लोहारी राघो के ग्रामीणों का कहना है कि वे अब जागरुक हो चुके हैं। अगले विस व लोकसभा चुनाव में एकजुट होकर पूरी तरह से सोच-विचार के बाद ऐसे उम्मीदवारों को वोट दिया जाएगा जो सारे गाँवों को एक समान समझता हो। पूर्व जन प्रतिनिधियों की तरह जातिगत भेदभाव करने वालों को बिल्कुल भी वोट नहीं दिया जागा।
अपने वर्करों की खुदगर्ज राजनीति को समझें राजनेता
नेताओं को भी चाहिए कि वे गाँवों में मौजूद अपने वर्करों की बातों पर आंखें मूंद कर विश्वास न करें। नेताओं को अपने विवेक से यह पता लगाना चाहिए कि जो काम उनका वर्कर कह रहा है, क्या उसमें उसका कोई निजी हित तो नहीं है? कहीं वह अपनी पहुंच का गलत फायदा उठाकर अपनी स्वार्थ सिद्धी में पूरे गाँव का बंटाधार तो नहीं कर रहा, जैसा कि गांवों में होता आ रहा है? नेताओं को सोचना होगा कि वर्कर सारे काम अपने ही करवाते रहेंगे और गाँव के सार्वजनिक कामों को रुकवाएंगे तो उनमें नुकसान किसका है। जिस दिन से विधायक, सांसद व नेता अपने वर्करों की असल मानसिकता को पढ़ना शुरु कर देंगे वास्तव में उसी दिन से गाँवों के अच्छे दिन शुरु हो जाएंगे।
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