- 2019 के घोटालेबाज फिर सिस्टम में, गरीब मजदूर बेरोजगार!
- क्या कुछ बेशर्म भ्रष्ट नेताओं के संरक्षण में पल रहा भ्रष्ट सिस्टम?
लोहारी राघो में मनरेगा लूट कांड पार्ट-2
संदीप कम्बोज
मनरेगा जिसे अब नए नाम ‘जय राम जी योजना’ के नाम से जाना जाता है। जिस योजना को भारत सरकार ने गरीबों को रोजगार देने और गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू किया था, वही योजना लोहारी राघो गांव में भ्रष्टाचारियों के लिए ‘कमाई मशीन’ बनती नजर आ रही है। 2019 का घोटाला दबा, 2026 में फिर वही खेल! क्या राजनीतिक संरक्षण सब कुछ बचा लेगा? लोहारी राघो गांव एक बार फिर मनरेगा घोटाले की बदबू से सुलग रहा है। वर्ष 2019 में उजागर हुए मनरेगा घोटाले ने पूरे प्रशासन को हिला दिया था। सरपंच, ग्राम सचिव और मेट निलंबित हुए। लगा कि सिस्टम सुधरेगा। लेकिन आज, 2026 में, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने साबित कर दिया है कि घोटाला सिर्फ दबाया गया था, खत्म नहीं हुआ था। 2019 में उजागर हुए लाखों रुपये के मनरेगा घोटाले के बाद भी सिस्टम सुधरा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों को राजनीतिक संरक्षण देकर फिर से सत्ता के गलियारों में बैठा दिया गया। अब सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने फिर से मनरेगा की काली सच्चाई उजागर कर दी है। वीडियो में देखा जा सकता है कि गांव के अपने मजदूर बेरोजगार बैठे हैं, जबकि दूसरे गांवों से मजदूरों को बुलाकर काम करवाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब गांव में ही मजदूर मौजूद हैं तो बाहर से मजदूर क्यों? क्या यह फर्जी हाजिरी और पैसे की हेराफेरी का नया तरीका है? सूत्रों का दावा है कि आज भी मास्टर रोल में फर्जी नाम चढ़ाकर लाखों रुपये का गबन किया जा रहा है। इस खेल में सरपंच, मनरेगा मेट, ग्राम सचिव और बीडीपीओ कार्यालय की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। बिना प्रशासनिक मिलीभगत के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं माना जा रहा।
2019 का घोटाला: जब गर्भवती महिलाएं और अपंग भी मजदूर बना दिए गए
2019 में आरटीआई के जरिए खुलासा हुआ था कि गर्भवती महिलाएं, अपंग, नेत्रहीन और अस्पताल में भर्ती मरीजों को भी मनरेगा मजदूर दिखाकर उनके खातों में लाखों रुपये जमा करवा दिए गए। 51 लोगों के खातों में 6.13 लाख रुपये से अधिक की राशि डाल दी गई थी। उस समय प्रशासन ने सरपंच, ग्राम सचिव और मेट को निलंबित कर दिया था, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते सभी को बहाल कर दिया गया। यही नहीं, वर्तमान पंचायत ने उन्हीं मेटों को फिर से नौकरी पर रख लिया, जिन पर पहले घोटाले के आरोप थे।
लोहारी राघो मनरेगा लूट कांड की कलंक कथा : मेटों ने पार कर दी थी भ्रष्टाचार की सारी हदें
राजनीतिक संरक्षण: भ्रष्टाचार की ढाल
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि इस पूरे खेल के पीछे राजनीतिक संरक्षण है। आरोप है कि कुछ नेता इस पूरे मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि भ्रष्टाचार की परतें उजागर न हों।
गरीब मजदूर सबसे बड़ा शिकार
मनरेगा गरीबों के लिए बनी योजना है, लेकिन यहां गरीब मजदूरों को ही काम से वंचित किया जा रहा है। गांव के लोग बेरोजगार हैं, जबकि सरकारी पैसा फर्जी मजदूरों और बाहरी लोगों के नाम पर निकाला जा रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट : गांव के मजदूर खाली, बाहर से मजदूर लाए गए
लोहारी राघो में हाल ही में वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि गांव के स्थानीय मजदूर बेरोजगार बैठे हैं, जबकि दूसरे गांवों से मजदूरों को लाकर मनरेगा कार्य करवाया जा रहा है। मौके पर पहुंचे एक यूट्यूबर ने काम कर रहे मजदूरों से बातचीत की। एक मजदूर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा: हमें तो बस दिहाड़ी चाहिए। कौन सा गांव है, कौन सरपंच है, हमें क्या पता। जब उनसे पूछा गया कि स्थानीय मजदूर क्यों नहीं काम कर रहे, तो उन्होंने कंधे उचकाते हुए कहा: हमें तो यहां भेज दिया गया है, बाकी हमें कुछ नहीं पता। यह जवाब खुद में कई सवाल खड़े करता है।
अंदरूनी सूत्रों का खुलासा: यह सिर्फ मजदूरी नहीं, मास्टर रोल का खेल है
हमारी टीम ने कुछ स्थानीय सूत्रों से बातचीत की। एक सूत्र ने बताया मनरेगा में असली खेल मास्टर रोल का होता है। कौन काम कर रहा है, कौन नहीं—कागजों में सब कुछ बदल जाता है। सूत्र के अनुसार, कई बार फर्जी मजदूरों के नाम मास्टर रोल में डाले जाते हैं कई बार वास्तविक मजदूरों की जगह दूसरे लोगों के खाते में पैसा जाता है कुछ लोग सिर्फ कागजों में मजदूर होते हैं
2019 का घोटाला: जब गर्भवती, अपंग और अस्पताल में भर्ती लोग भी मजदूर बना दिए गए
2017 में ग्रामीणों ने आरटीआई के माध्यम से मनरेगा मजदूरों की सूची मांगी थी।जो तथ्य सामने आए, वे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक थे। सूची में ऐसे नाम थे गर्भवती महिलाएं, नेत्रहीन और अपंग व्यक्ति, अस्पताल में भर्ती मरीज और ऐसे लोग जिन्होंने कभी मजदूरी नहीं की। कुल 51 लोगों के खातों में 6 लाख 13 हजार रुपये से अधिक की राशि डाल दी गई थी। एक ग्रामीण ने कहा हम खेतों में काम ढूंढते रहे और जिन लोगों ने कभी मिट्टी नहीं छुई, उनके खातों में पैसा जाता रहा।
निलंबन: दिखावा या जनता को शांत करने का नाटक?
घोटाला सामने आने के बाद प्रशासन ने सरपंच, ग्राम सचिव और मेट को निलंबित किया। मीडिया में खबरें चलीं। लगा कि सिस्टम सुधर जाएगा। लेकिन कुछ महीनों बाद सभी को बहाल कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे राजनीतिक दबाव था। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा: ऊपर से दबाव था। फाइलें रोक दी गईं। कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने दी गई।
सबसे बड़ा सवाल: घोटालेबाज मेटों को फिर क्यों रखा गया?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान पंचायत ने उन्हीं कथित घोटालेबाज मेटों को फिर से नियुक्त कर दिया। एक ग्रामीण ने गुस्से में कहा जब पहले घोटाला हुआ था तो इन्हें हटाया गया था। फिर इन्हें वापस क्यों लाया गया? साफ है कि सिस्टम में मिलीभगत है।
राजनीतिक संरक्षण: भ्रष्टाचार की सबसे मजबूत ढाल
ग्रामीणों और सूत्रों का आरोप है कि इस पूरे खेल के पीछे राजनीतिक संरक्षण है। एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा जब तक ऊपर से संरक्षण रहेगा, तब तक कोई कार्रवाई नहीं होगी। सरपंच, सचिव, मेट सब नेताओं के इशारे पर चलते हैं।
- राजनीतिक दबाव का असर प्रशासनिक कार्रवाई पर भी दिखता है।
- रिकवरी के आदेश हुए, लेकिन पैसा वापस नहीं आया
- जांच रिपोर्ट बनी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई
- निलंबन हुआ, लेकिन बहाली भी हो गई
गरीब मजदूर: सबसे बड़ा शिकार
मनरेगा गरीबों के लिए है। लेकिन लोहारी राघो में गरीब मजदूरों को काम नहीं मिल रहा। एक बेरोजगार मजदूर ने कहा: हम काम मांगते हैं तो कहते हैं काम नहीं है। और कागजों में दिखाते हैं कि काम हो रहा है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों की हत्या है।
मास्टर रोल: भ्रष्टाचार का असली दस्तावेज
मनरेगा में मास्टर रोल सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। अगर मास्टर रोल में गड़बड़ी हो, तो पूरा सिस्टम भ्रष्ट हो जाता है। सूत्र बताते हैं फर्जी नाम, फर्जी उपस्थिति, फर्जी भुगतान। इन सबके जरिए सरकारी धन की लूट की जाती है। ग्राम सचिव और बीडीपीओ कार्यालय की भूमिका मनरेगा में भुगतान बिना प्रशासनिक प्रक्रिया के संभव नहीं है। इस तरह के घोटालों में ग्राम सचिव, मेट, बीडीपीओ , तकनीकी सहायक और जेई, इन सभी की भूमिका होती है। अगर घोटाला हो रहा है, तो जिम्मेदारी केवल सरपंच की नहीं हो सकती।
नेताओं की भूमिका: इशारों पर चलता सिस्टम
ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय नेताओं के इशारों पर ही पूरा सिस्टम चलता है। अगर नेता चाहें तो कार्रवाई रुक जाती है। अगर नेता चाहें तो दोषी बच जाते हैं। एक सूत्र ने कहा यह गांव का नहीं, सिस्टम का घोटाला है। जब ऊपर से संरक्षण होगा, तो नीचे कोई डर नहीं रहेगा।
सोशल मीडिया और यूट्यूब: नई जांच एजेंसी?
इस मामले में दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया और यूट्यूब ने घोटाले को फिर उजागर किया।
आज पत्रकारिता का काम यूट्यूबर और सोशल मीडिया कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा है? सरकार क्या कर रही है?
बड़े सवाल जो सिस्टम से पूछे जाने चाहिए
जब गांव में मजदूर थे, तो बाहर से मजदूर क्यों बुलाए गए?
मास्टर रोल में किसके नाम दर्ज हैं?
भुगतान किसके खातों में गया?
2019 के घोटाले की रिकवरी क्यों नहीं हुई?
दोषियों को बहाल क्यों किया गया?
नेताओं ने हस्तक्षेप क्यों किया?
मास्टर रोल और भुगतान रिकॉर्ड की हो फॉरेंसिक जांच
क्या
प्रशासन इस बार सख्त कार्रवाई करेगा? क्या लूटी गई सरकारी राशि की रिकवरी
होगी? क्या दोषियों को जेल भेजा जाएगा? या फिर राजनीतिक पहुंच एक बार फिर
भ्रष्टाचारियों को बचा लेगी? अब ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की
उच्चस्तरीय जांच हो, मास्टर रोल और भुगतान रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच कराई
जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
विशेषज्ञों की राय
ग्रामीण विकास विशेषज्ञों का कहना है कि मनरेगा में पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ी समस्या है। एक विशेषज्ञ ने कहा अगर राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म न हुआ, तो मनरेगा हमेशा भ्रष्टाचार का शिकार रहेगा।
कानून क्या कहता है?
- मनरेगा में फजीर्वाड़ा करने पर
- सरकारी धन की वसूली
- भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत केस
- जेल तक की सजा
लेकिन लोहारी राघो में कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सिस्टम की सड़ांध या जनता की चुप्पी?
लोहारी राघो का मनरेगा घोटाला सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह पूरे ग्रामीण प्रशासनिक सिस्टम की सड़ांध को उजागर करता है। अगर राजनीतिक संरक्षण खत्म नहीं हुआ,अगर प्रशासन स्वतंत्र नहीं हुआ,
अगर जनता सवाल नहीं पूछेगी, तो मनरेगा जैसी योजनाएं गरीबों की नहीं, बल्कि नेताओं और अफसरों की कमाई का साधन बनी रहेंगी।
संदीप कम्बोज
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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