- आखिर चुनाव में गाँव के कौन दल्ले पैसों के लिए बेचते हैं ग्रामीणों के वोट, कौन कर रहा रसूखदार गाँव को बदनाम
- क्या गांव के माथे बिकने का कलंक लगाने वाले ऐसे राजनीतिक दल्लों का ग्रामीणों को अब करना नहीं चाहिए सामाजिक बहिष्कार
- वोट बिके या आरोप उछले? लोहारी राघो की साख, लोकतंत्र और सिस्टम सब पर सवाल
Lohari Ragho Election Controversy : Money Bags & Vote Buying Allegations
संदीप कम्बोज। खबरदार भारत
हरियाणा के जिला हांसी की नारनौंद विधानसभा अंतर्गत आने वाले गांव लोहारी राघो में अंबेडकर जयंती के मंच से निकले शब्द अब सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं रह गए हैं बल्कि पूरे गांव की पहचान, लोकतंत्र की साख और चुनावी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल बनकर खड़े हो गए हैं। नारनौंद के विधायक जस्सी पेटवाड़ ने बिना नाम लिए जिस तरह ‘पैसों के झोले’ और ‘धन्ना सेठ’ की बात कही, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या पूर्व में लोहारी राघो में चुनाव पैसे से जीते जाते रहे हैं? क्या यहां वोटों की खरीद-फरोख्त होती रही है ? हालांकि विधायक जस्सी पेटवाड़ ने सीधे-सीधे यह नहीं कहा कि लोहारी राघो गांव 'बिकाऊ' है लेकिन चुनावों के दौरान नेताओं द्वारा नोटों का बड़ा झोला भेजना यह स्पष्ट इशारा कर रहा है कि गांव लोहारी राघो में नोटों के दम पर वोट खरीदे जाते रहे हैं।
विधायक के इस बयान ने मचाई हलचल
कार्यक्रम के दौरान विधायक जस्सी पेटवाड़ ने कहा, ‘मैं वैसा नहीं हूँ जो कहा करते थे कि लोहारी राघो वालों मैं तो पैसों का झोला भेजता हूँ, तब यहां से जीतता हूँ’। यह बयान सीधे-सीधे किसी का नाम लिए बिना पूर्व विधायकों पर गंभीर आरोप की तरह देखा जा रहा है। उन्होंने आगे ‘धन्ना सेठ’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अब वो समय चला गया जब पैसे वाले लोग चुनाव जीतते थे।
सबसे बड़ा सवाल : क्या लोहारी राघो ‘बिकाऊ गांव’ है?
यही वो सवाल है जिसने पूरे मामले को विस्फोटक बना दिया है। अगर किसी नेता के अनुसार यहां ‘पैसों के झोले’ भेजकर जीत हासिल की जाती रही, तो इसका सीधा मतलब क्या है? क्या गांव में वोटों की कीमत तय होती रही? क्या चुनाव लोकतंत्र नहीं बल्कि ‘डील’ बनकर रह गए? यदि डील की गई तो क्या खुद चुनाव लड़ने वाले नेताओं ने की या उनके द्वारा नियुक्त किए गए चुनावी दल्लों ने? यदि यह डील दल्लों ने की तो क्या वे इसी गाँव लोहारी राघो से ताल्लुक रखते थे? विधायक द्वारा लगाए गए इस आरोप ओर इशारे के बाद गांव में भी ग्रामीण दबी जुबान कहने लगे हैं कि विधायक महोदय ने गांव में पनपे दल्ला कल्चर की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
‘दल्ला सिस्टम’ या ‘बिचौलिया नेटवर्क’?
इस बयान के साथ ही एक और बड़ा मुद्दा सामने आता है गांव में पनपा कथित ‘बिचौलिया सिस्टम’। विधायक ने साफ कहा, मेरे से मिलने के लिए किसी बिचौलिए की जरूरत नहीं है, सीधे आओ। यह सिर्फ एक लाइन नहीं थी, बल्कि एक बड़े सिस्टम पर हमला माना जा रहा है। विधायक के इसी बयान से सवाल उठते हैं क्या पहले गांव में कुछ लोग नेताओं और जनता के बीच ‘फिल्टर’ बनकर बैठे थे? क्या वही लोग तय करते थे कि किस ग्रामीण को नेता से मिलवाया जाए और किसे नहीं ? किसका काम होगा और किसका नहीं? विधायक किस ग्रामीण से बात करे और किससे नहीं ? क्या चुनावों में भी यही लोग ‘सौदेबाजी’ करवाते थे?
कथित ‘वोट दलाल’ लोहारी राघो की साख पर खतरा?
चुनावों के दौरान स्थानीय चर्चार्ओं में यह भी सामने आता है कि चुनाव के दौरान प्रति वोट पैसे तय होते हैं नेता बड़ी रकम देते हैंऔर कथित दलाल उसका हिस्सा खुद रख लेते हैं। उदाहरण के तौर पर चर्चा यह भी है कि अगर प्रति वोट 5000 दिया गया, तो वोटर तक 2500 रुपए ही पहुंचता है बाकी रकम ‘दलाली’ में चली जाती है जिसे यही पैसा बांटने वाले दलाल आपस में बांट लेते हैं। यह चर्चा गांव के बच्चे-बच्चे के जुबान पर होती है। अगर चुनावों में गांव में ऐसा कुछ भी होता है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।
विकास क्यों पिछड़ा? क्या यह असली कारण है?
सबसे गंभीर सवाल यहीं खड़ा होता है अगर कोई नेता पैसे देकर वोट खरीदता है, तो क्या वह उस गांव का विकास करेगा? विधायक जस्सी पेटवाड़ के बयान का यही सीधा संकेत भी माना जा रहा है। इशारा साफ है जो पैसे देकर जीतता है, वो विकास नहीं, वसूली करता है। और यही कारण बताया जा रहा है कि लोहारी राघो विकास के मामले में पीछे रहा। यहां सिर्फ कुछ नेताओं के दलाल परिवार और दल्लागिरी एजेंट ही मजबूत हुए। पूरे गांव को उसका लाभ नहीं मिला।
ग्रामवासियों के लिए सबसे बड़ा सवाल : क्या जानबुझकर चुप हैं ग्रामीण
अब सबसे अहम सवाल गांव के लोगों के सामने है क्या उन्हें इस कथित सिस्टम की जानकारी नहीं? या सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधी हुई है? क्या अब समय नहीं आ गया कि ऐसे तत्वों का पदार्फाश किया जाए?
जस्सी पेटवाड़ के भाषण का सीधा संदेश
- बिचौलिया सिस्टम खत्म होना चाहिए।
- जनता सीधे प्रतिनिधि से जुड़े न कि दलालों के माध्यम से।
- वोट बिकने नहीं चाहिए।
- राजनीति में पैसे का खेल खत्म होना चाहिए।
सियासत या सच्चाई?
विधायक द्वारा लगाए गए आरोप अगर सही हैं तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है। अगर यह सिर्फ राजनीतिक हमला है तो फिर गांव की छवि को बेवजह नुकसान हो रहा है।
गांव की छवि पर कलंक का खतरा, क्या अब करना होगा कथित दलालों का सामाजिक बहिष्कार
अगर यह धारणा बनती है कि लोहारी राघो में वोट बिकते हैं, तो यह पूरे गांव की प्रतिष्ठा पर दाग है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गलत संदेश है। ‘बिकाऊ गांव’ का टैग किसी भी समाज के लिए सबसे बड़ा अपमान होता है। और बड़ी बात यह है कि गांव के 90 फीसद से ज्यादा लोग इन चुनावी दलालों को अच्छी तरह से जानते हैं। चुनावों में नेताओं के लिए वोट खरीदने वाल एक-एक दल्ले की हरकतों बारे लगभग पूरा गाँव जानता है लेकिन कोई भी इनके खिलाफ कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। यानि की गांव के लोगों ने ही गांव को बेचने वाले ऐसे दलालों को सिर पर चढ़ा रखा है कि तुम मजे से चुनावों में गांव को बेचो और पैसे कमाओ, गांव की बदनामी से तुम्हें कोई मतलब नहीं। और बड़ी बात चुनावों में वोटों की खरीद-फरोख्त करके पूरे गांव के माथे पर बिकाऊ होने का कलंक लगाने वाले ये कथित चुनावी दलाल संख्या में मात्र आधा दर्जन ही हैं। मात्र आधा दर्जन ये दलाल लोहारी राघो गांव को सालों से बदनाम करते आ रहे हैं। क्या अब ग्रामीणों को ऐसे चुनावी दलालों का सामाजिक बहिष्कार नहीं करना चाहिए जो पिछले 30 साल से हर चुनाव में गांव के वोटों का नेताओं के साथ सौदा करके दलाली खाते आ रहे हैं? इस विषय पर पूरे गांव को अब गंभीर मंथन करना होगा। गांव लोहारी राघो के माथे से बिकाऊ होने का दाग तभी मिट सकता है जब जात-पात से दूर हट इन कथित दल्लों का गांव में सार्वजनिक तौर पर सामाजिक बहिष्कार किया जाए। क्या इन कथित दलालों के ऊपर इनके ऊपर गांवद्रोह का आरोप लगाया जाए जो गांव में वोटों का सौदा करते आ रहे हैं।
‘दलाल नेटवर्क’ को खत्म कर बच सकती है लोहारी राघो की साख
क्या यहां लोकतंत्र बिकता है? या यह सिर्फ सियासी आरोपों का खेल है? लेकिन एक बात साफ है अगर गांव को अपनी पहचान बचानी है, तो उसे ऐसे हर शक, हर सिस्टम और हर कथित ‘दलाल नेटवर्क’ से खुद को अलग करना होगा। आज हर ग्रामीण को इन कथित दल्ला गैंग की असलियत और इनके द्वारा नेताओं से उठाए जा रहे निजी फायदे वाली सोच को समझना होगा। ग्रामीणों को यह बात गांठ मारनी होगी कि जो पैसों के लिए अपने गांव के इमान को बेच सकते हैं यानि पूरे गांव को बिकाऊ होने का कलंक लगवा सकते हैं तो कल को वे किसी भी हद तक गुजर सकते हैं। चुनावों के समय ऐसे कथित दलालों से दूरी बनानी होगी जो वोटों की खरीद-फरोख्त से जुड़े हैं। समझना होगा कि वोट की कीमत नोट नहीं, सम्मान होता है अब फैसला लोहारी राघो को करना है।
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